शिक्षा, समाज और राजनीति

शिक्षा, समाज और राजनीति


      शिक्षा मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति का सशक्त बिना शिक्षा के हम सभ्य, सशक्त, सक्षम. सर्वगुण सम्पन्न और सुदृढ़ समाज की कल्पना भी नहीं कर सकते। बिना शिक्षा के समाज असभ्य, अशक्त, असमर्थ, गुणहीन और निर्बल होता है। शिक्षा कैसी हो यह विषय मेरे मतानुसार विचारणीय तो हो सकता है। लेकिन बहस का विषय बिल्कुल नहीं। लेकिन खेद है कि आज शिक्षा जैसे विषय को भी कुछ लोगों ने विचारणीय कम विवाद का विषय अधिक बनाने की कोशिश की है। शिक्षा जैसे पावन विषय को विवाद का विषय बनाना अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। शिक्षा मौलिक अधिकार, मौलिक आवश्यकता और मौलिक आधार है। यदि व्यक्ति, समाज व राष्ट्र इस अधिकार, आवश्यकता और आधार से हीन है तो उस व्यक्ति का व्यक्ति होते हुए भी अस्तित्व नहीं है, समाज होते हुए भी समाज का अस्तित्व नहीं है तथा राष्ट्र होते हुए भी वह अस्तित्वहीन है। जातिवाद, प्रान्तवाद, भाषावाद, शिक्षा पर मजहबी जुनून और यदि वोट बैंक हावी होगा तो शिक्षा का ताना-बाना उलझकर रह जाएगा और शिक्षा के पावन उद्देश्य उपरोक्त वादों के व्यूह में फंस जाएंगे, इसका दुष्परिणाम यह होगा कि व्यक्ति समाज और राष्ट्र निर्माण की संभावनाएं समाप्त हो जाएंगी। व्यक्ति सच्चे अर्थों में तभी व्यक्ति बनने में समर्थ होगा जब वह शिक्षित होगा. समाज भी सच्चे अर्थों में समाज तभी बनेगा जब वह शिक्षित होगा और राष्ट्र भी सच्चे अर्थों में राष्ट्र तभी बनेगा जब वह शिक्षित होगा। यही चर्चा जब मैं अपने एक मित्र से कर रहा था तो वे मेरे उपरोक्त मंथन पर प्रतिक्रिया देते हुए बोले- शास्त्री जी! क्या आज का व्यक्ति, आज का समाज और आज का राष्ट्र आपको अशिक्षित नजर आता है। मैंने उनके प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व एक प्रश्न किया कि आपके अनसार एक शिक्षित व्यक्ति, एक शिक्षित समाज और एक शिक्षित राष्ट्र की क्या पहचान है और उसके क्या मापदण्ड हैं? क्या केवल साक्षर व्यक्ति, साक्षर समाज और साक्षर राष्ट्र को ही आप शिक्षित व्यक्ति, शिक्षित समाज और शिक्षित राष्ट्र मानते हैं?


      जब मैंने उक्त प्रश्न किए तो उन्होंने मेरे प्रश्नों को ही उत्तर मानते हुए कहा कि “साक्षर होना शिक्षित होने का मापदण्ड नहीं है तथा साक्षर होने और शिक्षित होने में रात दिन का अन्तर है। उसके साथ साथ साक्षर होने और शिक्षित होने के उद्देश्य में भी काफी अन्तर हैजितना पुरुषार्थ किसी को साक्षर करने के लिए आवश्यक है उससे कई गुना अधिक पुरुषार्थ शिक्षित करने के लिए अपेक्षित है।


      अथर्ववेद में शिक्षा का और उसके उद्देश्यों का विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है। अथर्ववेद का ब्रह्मचर्य सक्त समस्त शिक्षा व्यवस्था और उसके उददेश्यों. महत्वों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करता है। अथर्ववेद में आता है।। आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः।


     इसके अतिरिक्त दूसरे मन्त्र में कहा गया है-


      "ब्रह्मचारी समिधा मेखया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्ति। अर्थात् - आचार्य अन्तेवासी का उपनयन करते हुए उसे अपने नियन्त्रण में रखते हैं और ब्रह्मचारी समिधा, मेखला और विधाध्ययन के लिए तप करते हुए लोकों (समाज व राष्ट्र) का विद्या द्वारा उसके पालन (रक्षा) में अपनी भूमिका निभाता है। समिधा यज्ञ का, तो मेखला और ब्रह्मचर्य व्रत का उपदेश करते हैं, जैसे अग्निहोत्र में समिधा अग्नि स्वरूप हो जाती है। ब्रह्मचारी भी विद्यारूपी यज्ञ में खुद को समिधा बनकर समर्पित करके विद्यावान हो जाता है और विद्या के तेज से शिक्षा के बल से लोक (समाज व राष्ट्र) को भी विद्या के तेज से आलोकित करता है


      वर्तमान शिक्षा प्रणाली और प्राचीन शिक्षा प्रणाली के मौलिक अन्तर को मैं जितना समझ पाया हूं उसके अनुसार वर्तमान शिक्षा में भौतिकवाद प्रधान है जिसके कारण इस शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत हम पढ़ने और पढ़ाने वाले भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शिक्षा को एक साधन के रूप में प्राप्त करने का पुरुषार्थ करते हैं जिसे मैं बाह्य उद्देश्यों (सांसारिक सुख साधनों) की प्राप्ति का साधन भी कह सकता हूं। क्योंकि वर्तमान शिक्षा में प्रायशः उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ही अधिक पुरुषार्थ किया जाता है। इसमें व्यक्ति का आन्तरिक निर्माण अथवा व्यक्तित्व विकास का कार्य या तो है नहीं. यदि है भी तो केवल नाम मात्र के लिए। इसके अतिरिक्त वर्ममान शिक्षा प्रणाली रोजगार और आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली से बुरी तरह प्रभावित हैं। इसके विपरीत प्राचीन शिक्षा प्रणाली व्यक्तित्व विकास, चरित्र निर्माण, समाज व राष्ट्र निर्माण जैसे आन्तिरिक उद्देश्यों पर आधारित होती थी। प्राचीन शिक्षा प्रणाली आन्तरिक और बाहय दोनों ही उद्देश्यों की प्राप्ति का एक सशक्त साधन होती थी।


      पाठक सोच रहे होंगे कि प्राचीन शिक्षा प्रणाली और आधुनिक शिक्षा प्रणाली का बहाना लेकर मैं आधुनिकता के पथ पर तेजी से चलते समाज की नकारात्मक समीक्षा करने लगा हूं। किन्तु ऐसा नहीं है। सत्य यह है कि हमारा समाज (राष्ट्र) जब से प्राचीन  शिक्षा प्रणाली से मुक्त हो पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली की छाया के शिकंजे में आया है तब से हमारा सामाजिक और पारिवारिक जीवन तनाव और समस्याग्रस्त हो गया है। समाज किसको कहते हैं। सामान्यत समूह ही समाज कहलाता है। समूह में रहना मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। मनुष्य समाज (समूह) में रहकर ही अपनी उन्नति (विशेषकर सांसारिक उन्नति) कर सकता है। मनुष्य समाज में रहकर ही अपने उद्देश्य निर्धारित कर उनकी प्राप्ति का पुरुषार्थ कर सकता है। समाज (समूह) में रहकर ही मनुष्य मानव जीवन की बहुत सी मान्यताओं से परिचित होता है। समाज (समूह) में रहकर ही मनुष्य पारस्परक सहयोग, लेना देना और आन्तरिक भावनाओं का आदान प्रदान करना सीखता है। इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि समाज (समूह) मनुष्य को मानवता का, सामूहिक उत्तरदायित्व का, कर्तव्य पालन का पाठ पढ़ाने की पाठशाला है। सांसारिक सुखों तथा उसके साधनों को भोगने व पाने का केन्द्र (साधन) है। सम्भवतः यही कारण है जब हमारे मनीषियों, दार्शनिकों और विचारकों ने मनष्य को सामाजिक प्राणी कहा है। सखों को पाने का साधन तथा उनको भोगने का केन्द्र समाज, उत्तरदायित्वों निभाने और कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने वाली पाठशाला के समान समाज कैसा हो? यह प्रश्न सबके लिए विचारणीय है। समाज जब मनुष्य जीवन का इतना महत्वपूर्ण घटक है तो वह कैसा हो? इस पर गम्भीर आत्ममंथन आवश्यक है। वतमान समाज जिस प्रकार की शिक्षा और सभ्यता की बुनियाद पर टिका है उसमें बहुत से झोल हैं।


      हमारे समाज को जिस शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है उस पर वर्तमान में कभी गम्भीरता से सामाजिक अथवा राजनीतिक स्तर पर विचार हुआ है। ऐसा मुझे लगता नहीं क्योंकि यदि विचार किया जाता तो वर्तमान शिक्षा में नैतिकता, व्यक्तित्व विकास, चरित्र निर्माण, सदाचार और शिष्टाचार का अभाव नहीं होता। छात्रवर्ग में अपराधी पवृत्ति नहीं पनपती, माता-पिता, शिक्षक तथा बुजुर्गों के सम्मान में गिरावट नहीं आती। वर्तमान शिक्षा का ढांचा मैं कह सकता हूं, पूरी तरह से पाश्चात्य दर्शन पर आधारित है। पाश्चात्य दर्शन हमारी शिक्षा व्यवस्था को कभी समचित दिशा प्रदान नहीं कर सकता। इसके बाद भी हमारे समाज में पाश्चात्य दर्शन प्रभावित शिक्षा को ही थोप दिया गया है जिसमें न भारतीय संस्कृति की झलक है, जिसमें न धर्म की शिक्षा है न ही परोपकार की प्रेरणा है। केवल नाम मात्र की नैतिक शिक्षा की किताब लगाकर हमने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है।


       शिक्षा, समाज और राजनीति कहीं न कहीं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से न्यूनाधिक एक दूसरे के पूरक हैं। पुनरपि इन सबमें शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। मेरा ऐसा मानना है कि राजनीति समाज की एक बाह्य आवश्यकता है जबकि शिक्षा समाज की बाह्य और आन्तरिक दोनों ही आवश्यकताएं हैं। यदि मुझसे कोई पछेगा कि आप शिक्षा और राजनीति में किसे समाज के लिए वरदान मानते हैं तो मेरा स्वाभाविक उत्तर होगा शिक्षा, शिक्षा और शिक्षा। राजनीतिक का जब से शिक्षा में हस्तक्षेप हुआ, तब से शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था लड़खड़ाती सी नजर आ रही हैं। राजनीतिक दल जब सत्तासीन होते हैं, तो वे अपनी सुविधानुसार शिक्षा और समाज को दिशा-दशा निर्धारित करने वाली नीतियों का निर्माण करते हैं।


      राजनीति, समाज और शिक्षा को लेकर हमारे विचारकों ने जो मापदण्ड तय किए हैं उनके अनुसार यदि हमारी शिक्षा चारित्रिक, नैतिक आध्यात्मिक, मानवीय और सामंजस्य के उद्दशें को प्राप्त करने वाली है तो हमारा समाज भी नैतिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक तथा मानवीय गुणों से परिपूर्ण होगा। उपरोक्त गुणों से परिपूर्ण समाज सुलझी राजनीति का जनक बनेगा। हमारे राजनीतिक दल और दल के नेता या तो किंकर्तव्यविमूढ़ हैं या फिर वे किंकर्तव्यविम् नाटक करते हैं। राजनीति में शिक्षा हो यह निर्विवाद तथ्य है। लेकिन शिक्षा में राजनीति का होना शिक्षा, समाज और राजनीतिक के लिए भी दर्भाग्यपर्ण हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती शिक्षा और राजनीति पर सत्यार्थ प्रकाश में अपना व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। द्वितीय व तृतीय समुल्लास महर्षि जी ने विद्या (शिक्षा) को समर्पित किए हैंजबकि राजधर्म अथवा राजनीति के लिए उन्होंने केवल एक समुल्लस (छठा) लिखाइससे शिक्षा और राजनीति के महत्व के अन्तर को सहजता से समझा जा सकता है। राजनीति को शिक्षा की सेविका होना चाहिए, स्वामिनी नहीं। वर्तमान समाज में जो शिक्षा दी जा रही है वह शिक्षा परिणाम में दासत्व वाली है जिसका वर्णन राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने भारत भारती में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है।


दासत्व के परिणाम वाली आज है शिक्षा यहां।


हैं मुख्य दो ही जीविकाएं भृत्यता भिक्षा यहां।।


या तो कहीं बनकर मुहर्रिर पेट का पालन करो।


या मिल सके तो भीख मांगे अन्यथा भूखो मरो।


  शिक्षा यदि दासत्व के परिणाम वाली है तो उसका एकमात्र कारण है क्षुद्र राजनीति और तदाधारित स्वार्थ। हमें यदि व्यक्ति, राष्ट्र और समाज को विषमता, विडम्बना, विद्रूपता, वैमनस्य और व्यसन व्यूह से निकालना है तो शिक्षा को अवसरवादी राजनीति की काली छाया से मुक्त करना होगा और समाज के नव निर्माण की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाना होगा। तभी ऋषियों, महर्षियों, योगियों, मनीषियों और देशभक्त क्रान्तिकारियों के सपनों के व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव होगा। 


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