सम्बन्ध और आनंद

29/12/2019🌞ओ३म्🌞🙏🏻🙏🏻अओआ 🙏🏻🙏🏻
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह अकेला अपना जीवन नहीं जी सकता। उसे माता-पिता भाई-बहन चाचा बुआ मौसी मामा इत्यादि अनेक पारिवारिक संबंधों की आवश्यकता रहती ही है। 
इसके अतिरिक्त उसे अपना जीवन ठीक प्रकार से जीने के लिए कुछ मित्र भी चाहिएँ। समाज के लोग भी चाहिएँ, जो अनेक अवसरों पर उसको भिन्न-भिन्न प्रकार का सहयोग देते हैं। 
*इसके अतिरिक्त देशभर के करोड़ों व्यक्ति भी अपने-अपने ढंग से उसको सहयोग देते हैं। कोई बिजली बनाता है, कोई सड़क बनाता है, कोई रेलगाड़ी बनाता है, कोई टेलीविजन बनाता है, कोई फोन बनाता है आदि आदि। इस प्रकार से हम देखते हैं कि एक मनुष्य सब सुविधाओं को तभी प्राप्त कर पाता है जब करोड़ों व्यक्ति उसका सहयोग करते हैं। अनेक क्षेत्रों में हमें विदेशी लोगों का भी सहयोग लेना पड़ता है। कहने का सार यह हुआ कि संसार भर के लोग, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कहीं न कहीं हमारे सहयोगी होते हैं।* 
जो निकट संबंधी हैं, उनका तो हमें प्रतिदिन सहयोग लेना ही पड़ता है। यह सहयोग तभी  मिलता है जब हमारा व्यवहार उनके साथ अच्छा हो। *यदि हम दूसरों को सुख देते हैं तभी दूसरे लोग भी हमें सुख देंगे। यदि हम दूसरों को दुख देंगे, तो दूसरे लोग भी हमें दुख ही देंगे।*
तो जीवन को सुखमय बनाने के लिए, दूसरों को सुख देवें। उनके साथ मधुर संबंध बनाए रखें। उनको यथोचित सम्मान देवें। उनकी सेवा करें। तभी आपका जीवन भी सुखमय  बन पाएगा। छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा न करें। संबंध न तोड़ें। क्योंकि संबंध तोड़ना तो सरल है। कभी भी किसी के साथ भी, आप छोटी सी बात पर भी संबंध तोड़ सकते हैं। परंतु यदि संबंध टूट गया, तो उसे वापस प्रेममय स्थिति में जोड़ना बहुत कठिन हो जाएगा। *जैसे धागा टूटने पर वापस जुड़ तो जाएगा, परंतु उस में गाँठ आ जाएगी। ऐसे ही हो सकता है, संबंध टूटने पर वापस जुड़ भी जाए, परंतु फिर उसमें पहले जैसा आनंद नहीं होगा। इसलिए पूरा प्रयत्न करें, कि संबंध न टूटे। *थोड़ी जीवन में नम्रता सेवा परोपकार दया सहनशीलता आदि गुणों को अपनाएं, जिस से आप के संबंध बने रहें, और आपका जीवन सुखमय हो।*
 - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*


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