सलामतराय कौन थे



सलामतराय कौन थे




           परोपकारी में इस सेवक ने महाशय सलामतराय जी की चर्चा की तो माँग आई है कि उन पर कुछ प्रेरक सामग्री दी जाये। श्री ओमप्रकाश वर्मा जी अधिक बता सकते हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी की कोठी के सामने जो पहली बार जालंधर में उनके दर्शन किये, वह आज तक नहीं भूल पाया। भूमण्डल प्रचारक मेहता जैमिनि जी के व्याख्यान में कादियाँ में यह प्रेरक प्रसंग सुना था कि कन्या महाविद्यालय की स्थापना पर केवल पाँच कन्यायें प्रविष्ट हुई थीं। उनमें एक श्री सलामतराय जी की बेटी भी थी। महात्मा मुंशीराम जी की पुत्री वेदकुमारी तो थी ही। शेष तीन के नाम मैं भूल गया हूँ। इस पर नगर में पोपों ने मुनादी करवाई कि बेटियों को मत पढ़ाओ। पढ़-लिख कर गृहस्थी बनकर पति को पत्र लिखा करेंगी। यह कार्य (पत्र लिखना) लज्जाहीनता है। ऐसी-ऐसी गंदी बातें मुनादी करवाकर कन्या विद्यालय के कर्णधारों के बारे में अश्लील कुवचन कहे जाते थे।


         मेहता जी ने यह भी बताया था कि ऋषि भक्त दीवानों द्वारा यह मुनादी करवाई जाती थी कि विद्यालय में प्रवेश पानेवाली प्रत्येक कन्या को चार आने (१/४ रु०) प्रतिमास छात्रवृत्ति तथा एक पोछन (दोपट्टा) मिला करेगा। वे भी क्या दिन थे! कुरीतियों से भिड़ने वालों को पग-पग पर अपमानित होना पड़ता था। महाशय सलामतराय जी अग्नि-परीक्षा देने वाले एक तपे हुये आर्य यौद्धा थे।



         जो प्रेरक प्रसंग एक बार सुन लिया, वह प्रायः मेरे हृदय पर अंकित हो जाता है। महात्मा हंसराज के नाती श्री अमृत भूषण बहुत सज्जन प्रेमी थे। महात्माजी पर मेरी पाण्डुलिपि पढ़कर एक घटना के बारे में पूछा, ''यह हमारे घर की बात आपको किसने बता दी?'' मैंने कहा, क्या सत्य नहीं है? उन्होंने कहा, ''एकदम सच्ची घटना है, परन्तु मेरे कहने पर आप इसे पुस्तक में न देवें।'' वह अठारह वर्ष तक अपने नाना के घर पर रहे। उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ करता था कि इस लेखक को पुराने आर्य पुरुषों के मुख से सुने असंख्य प्रसंग ठीक-ठीक याद हैं।



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