‘पंडित चमूपति द्वारा अमर दयानन्द का स्तवन’



 


'पंडित चमूपति द्वारा अमर दयानन्द का स्तवन'




            पंडित चमूपति आर्यसमाज के विलक्षण विद्वान सहित हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, अरबी व फारसी आदि अनेक भाषाओं के विद्वान थे। आपने कई भाषाओं में अनेक प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की है। गुरुकुल में अध्यापन भी कराया, आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के उपदेशक व प्रचारक भी रहे। सोम सरोवर, चौदहवीं का चांद, जवाहिरे जावेद आदि आपकी प्रसिद्ध रचनायें हैं। सोम सरोवर ऐसी रचना है जिसका स्वाध्याय कर पाठक इस वेद ज्ञान की गंगा रूपी सोम सरोवर में स्नान का सा भरपूर आनन्द ले सकते हैं। इस ग्रन्थ में आपका लिखा एक एक शब्द अनमोल व पठनीय है जिसमें ईश्वर, वेद, व ऋषि दयानन्द के प्रति गहरी श्रद्धा व भक्ति के भाव भरे हुए हैं। प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने पं. चमूपति जी की विस्तृत जीवनी 'कविर्मनीषी पंचमूपति' के नाम से लिखी है जिसने इस विभूति को अमर कर दिया है। आज के इस संक्षिप्त लेख में हम पं. चमूपति जी की ऋषि दयानन्द को भाव भरित दयानन्द वन्दन रूपी श्रद्धांजलि के कुछ प्रेरणा व प्रभावशाली शब्दों को  प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इन शब्दों को पढ़ेंगे तो यह दयानन्द स्तवन आपकी ओर से ऋषि के प्रति श्रद्धांजलि होगी। इसे पढ़कर इसका आनन्द अवश्य लें।


        आज केवल भारत ही नहींसारे धार्मिक सामाजिकराजनैतिक संसार पर दयानन्द का सिक्का है। मतों के प्रचारकों ने अपने मन्तव्य बदल लिए हैंधर्म पुस्तकों के अर्थों का संशोधन किया हैमहापुरुषों की जीवनियों में परिवर्तन किया है। स्वामी जी का जीवन इन जीवनियों में बोलता है। ऋषि मरा नहीं करतेअपने भावों के रूप में जीते हैं। दलितोद्धार का प्राण कौन हैपतित पावन दयानन्द। समाज सुधार की जान कौन हैआदर्श सुधारक दयानन्द। शिक्षा के प्रचार की प्रेरणा कहां से आती हैगुरुवर दयानन्द के आचरण से। वेद का जय जयकार कौन पुकारता हैब्रह्मार्षि दयानन्द। माता आदि देवियों के सत्कार का मार्ग कौन सिखाता हैदेवी पूजक दयानन्द। गोरक्षा के विषय में प्राणिमात्र पर करूणा दिखाने का बीड़ा कौन उठाता हैकरुणानिधि दयानन्द।


           


            आओ ! हम अपने आप को ऋषि दयानन्द के रंग में रंगें। हमारा विचार ऋषि का विचार होहमारा आचार ऋषि का आचार होहमारा प्रचार ऋषि का प्रचार हो। हमारी प्रत्येक चेष्टा ऋषि की चेष्टा हो। नाड़ी नाड़ी से ध्वनि उठे – महर्षि दयानन्द की जय। 


 


 पापों और पाखण्डों से ऋषि राज छुड़ाया था तूने।


भयभीत निराश्रित जाति कोनिर्भीक बनाया था तूने।।


बलिदान तेरा था अद्वितीय हो गई दिशाएं गुंजित थी।


जन जन को देगा प्रकाश वह दीप जलाया था तूने।।


           हमारा सौभाग्य है और अपने इस सौभाग्य पर हमें गर्व है कि हम महर्षि दयानन्द द्वारा प्रदर्शित ईश्वरीय ज्ञान वेदों के अनुयायी है। महर्षि दयानन्द द्वारा प्रदर्शित मार्ग ऐहिक व पारलौकिक उन्नति अथवा अभ्युदय व निःश्रेयस प्राप्त कराता है। इसे यह भी कह सकते हैं कि वेद मार्ग योग का मार्ग है जिस पर चल कर धर्म, अर्थ काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। संसार की यह सबसे बड़ी सम्पादायें हैं। अन्य सभी भौतिक सम्पदायें तो नाशवान है परन्तु दयानन्द जी द्वारा दिखाई व दिलाई गई यह सम्पदायें जीते जी तो सुख देती ही हैं, मरने के बाद भी लाभ ही लाभ पहुंचाती हैं। इसी के साथ लेखनी को विराम देते हैं।


मनमोहन कुमार आर्य



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