नमस्कार का व्यापार

नमस्कार का व्यापार



      जब कोई मनुष्य किसी वयोवृद्ध सन्त, साधु, महात्मा के चरणों में वन्दना करता है, तथा चरण-स्पर्श करता है, तो वह अपने अहंकारभाव की भेंट उसके चरणों में देता है। उनके चरणस्पर्श करने से वृद्धजन जब प्रसन्न होजाते हैं तो समझो कि वे उसकी अहंकार की भेंट स्वीकार कर लेते हैं तब वही अहंकार उनके पास रह जाता है । आशय यह है कि आशीर्वाद जैसी उत्तम वस्तु देकर नीच वस्तु ग्रहण करते हैं। घाट का सौदा कर घाटे में रह जाते हैं।


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