नागरिकता संशोधन विधेयक कितना सही कितना गलत

हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नागरिकता संशोधन विधेयक को हरी झंडी दे दी है और संभावना है कि इसे जल्दी ही संसद में पेश किया जाएगा। इस विधेयक में पड़ोसी देशों से शरण के लिए भारत आए हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। हालांकि इस बिल को लेकर विपक्ष बेहद कड़ा रुख़ अख़्तियार कर रहा है और इसे संविधान की भावना के विपरीत बता रहा है। जहाँ केंद्र की तरफ से इसे शीर्ष प्राथमिकता देते हुए इसे सदन में रखे जाने के दौरान सभी सांसदों को उपस्थित रहने को कहा गया है। वहां ओवैसी समेत विपक्ष के कई नेताओं कहना है अगर नागरिकता संशोधन विधेयक लागू किया गया तो यह बिल भारत को इसराइल बना देगा।


आखिर इस बिल में ऐसा क्या है जो ओवेसी समेत विपक्ष को इतना एतराज है? अगर इस बिल को आसान भाषा में देखें तो इस विधेयक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक आधार पर उत्पीड़न के शिकार गैर मुस्लिम शरणार्थियों जिनमें हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारत की नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है। नागरिक संशोधन विधेयक 2019 के तहत सिटिजनशिप ऐक्ट 1955 में बदलाव का प्रस्ताव है। इस बदलाव के जरिए उन गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता दी जाएगी जो बीते एक साल से लेकर छह साल तक भारत में रह रहे हैं।


दूसरा फिलहाल, भारत में लागू सिटिजनशिप ऐक्ट 1955 के तहत नागरिकता हासिल करने की अवधि 11 साल है। यानि यदि आप ग्यारह साल से भारत में रह रहे है तो आपको यहाँ की नागरिकता मिल सकती है लेकिन अब इसी नियम में ढील देकर नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से छह साल तक किया जाना है। मतलब कि पाकिस्तान अफगानिस्तान बांग्लादेश में सताये गये हिन्दू बौद्ध सिख पारसी समुदाय के लोग अगर भारत में आते है तो उन्हें एक साल के अंदर यहाँ की नागरिकता मिल जाएगी।


इसका सबसे बड़ा लाभ होगा बंटवारे में पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आये और जम्मू कश्मीर में बसे हिन्दुओं को जो पिछले 70 वर्षों से नागरिकता की बाट जोह रहे है। क्योंकि कई लाख हिन्दू कश्मीर में अमानवीय स्थितियों में रहने के लिए विवश हैं। इन लोगों में एक बड़ा वर्ग बंटवारे के समय पश्चिम पाकिस्तान से आए उन हिंदुओं का है, जिन्हें भौगोलिक दूरी के साथ-साथ सांस्कृतिक रूप से जम्मू अपने ज्यादा नजदीक लगा और वे यहीं आकर अस्थायी तौर पर बस गए। यहां रहने वाले ज्यादातर लोगों ने शुरुआत में सोचा होगा कि वे समाज की मुख्य धारा में शामिल हो जाएंगे. लेकिन साल दर साल गुजरते गये उस समय पाकिस्तान से आया एक वर्ष बच्चा आज 71 वर्ष का बुजुर्ग हो गया पर उसे नागरिकता नहीं मिली। वो भी उस अंतर्राष्ट्रीय कानून के होते जिसमें अगर कोई महिला जहाज में सफर करते समय बच्चा पैदा करती है तो उस बच्चे को उस इलाके की नागरिकता हासिल करने का हक मिलता है जहाँ से जहाज गुजर रहा होता है। ये लोग तो 70 साल से ज्यादा समय से जम्मू और कश्मीर में रह रहे हैं इन्हें क्यों नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया है? जबकि इसके विपरीत बांग्लादेश से भारत में शरण लेकर लाखों की संख्या में मुस्लिम शरणार्थी यहाँ की नागरिकता हासिल कर चुके है।


विरोध का कारण यही हो सकता है क्योंकि इस बिल के लागू हो जाने पर अवैध रूप से भारत में बसे बंगलादेशी रोहिंग्या मुस्लिमों को अपने देश लौटना होगा। साल 1991 में असम में मुस्लिम जनसंख्या 28.42 प्रतिशत थी जो 2001 के जनगणना के अनुसार बढ़ कर 30.92 प्रतिशत हो गई और 2011 की जनगणना में यह बढ़कर 35 प्रतिशत को पार कर गयी। बांग्लादेशी मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी ने देश के कई राज्यों में जनसंख्या असंतुलन को बढ़ाने का काम किया है।


दूसरा बांग्लादेश से आए लोग पश्चिम बंगाल में आकर बसे हैं। बॉर्डर मैनेजमेंट टास्क फोर्स की वर्ष 2000 की रिपोर्ट के अनुसार 1.5 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठ कर चुके हैं और लगभग तीन लाख प्रतिवर्ष घुसपैठ कर रहे हैं। इस हिसाब से अगर 2019 का अनुमान लगाया जाये देश में 4 करोड़ घुसपैठिये मौजूद हैं। अगर ये बिल लागू होता है तो बंगाल की राजनीति में बड़ी उथल-पुथल हो सकती है। खासकर बांग्लादेश की सीमा से सटे बंगाल के इलाकों में। क्योंकि असम की तरह यहां भी जनसंख्या में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई है। पिछले कई वर्षों में पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में हिन्दुओं के ऊपर होने वाले सांप्रदायिक हमलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का ही हाथ रहा है।


यही नहीं इसके अलावा उत्तर पूर्व के राज्य त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड में भी अवैध रूप से बांग्लादेशी रह रहे हैं। इसके अलावा उड़ीसा, त्रिपुरा और छत्तीसगढ़ में भी अवैध रूप से भारत आए बांग्लादेशी रहते हैं। अकेली राजधानी दिल्ली की बात करें यहाँ भी करीब 40 हजार रोहिंग्या मुस्लिमों के अलावा बड़ी संख्या बंगलादेशी अवैध रूप से रह रहे है इनके बाहर निकाले जाने की बात सेकुलर लिबरल वामपंथी कथित सामाजिक कार्यकर्ता हर बार शोर मचा देते है।


इस विधेयक को 19 जुलाई, 2016 को लोकसभा में पेश किया गया था। 12 अगस्त, 2016 में इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया था। समिति की रिपोर्ट आने के बाद 08 जनवरी, 2019 को विधेयक को लोकसभा में पास किया गया। लेकिन राज्यसभा में इसे पेश नहीं किया जा सका था। बहरहाल, मुश्किल वाली बात यह है कि असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में इस विधेयक के खिलाफ लोगों का बड़ा तबका प्रदर्शन कर रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये विधेयक भारत के संविधान के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है। धर्म के आधार पर किसी को नागरिकता नहीं दी जा सकती. भाजपा इस विधेयक के ज़रिए हिंदूत्व का एजेंडा मज़बूत करना चाहती है।


Popular posts from this blog

ब्रह्मचर्य और दिनचर्या

वैदिक धर्म की विशेषताएं 

अंधविश्वास : किसी भी जीव की हत्या करना पाप है, किन्तु मक्खी, मच्छर, कीड़े मकोड़े को मारने में कोई पाप नही होता ।