महर्षि दयानन्द के शिक्षा सबन्धी मौलिक विचार



महर्षि दयानन्द के शिक्षा सबन्धी मौलिक विचार




           महर्षि दयानन्द के शिक्षा विषयक मौलिक विचार सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय समुल्लास में संकलित हैं। समुल्लास के विषय का निर्देश करते हुए स्वामी जी लिखते हैं- 'अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामः।' अर्थात् इस समुल्लास में शिक्षा-सबन्धी विचारों का प्रतिपादन होगा। स्वामी जी ने इस विषय में अपनी विचार-सबन्धी स्पष्टता का प्रशंसनीय परिचय दिया है। उनके विचार उलझे हुए नहीं हैं, सभी मन्तव्य स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किये गए हैं। प्रत्येक मन्तव्य अपने-आप में पूर्ण है। स्वामी जी ने इस समुल्लास में शिक्षा के मूलभूत सिद्धान्तों पर ही अपना मत प्रकट किया है। पाठयक्रम सबन्धी विस्तृत सूचनायें उपस्थित करना उन्हें (द्वितीय समुल्लास में) अभीष्ट नहीं।


           स्वामी जी के विचार से ज्ञानवान् बनने के लिए निमनलिखित तीन उत्तम शिक्षक अपेक्षित होते हैं- माता, पिता और आचार्य। शतपथ ब्राह्मण का निम्नलिखित वचन उनके उक्त विचार का आधार है।


'मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद।'


         अर्थात् वही पुरुष ज्ञानी बनता है, जिसे शिक्षक के रूप में प्रशस्त माता, प्रशस्त पिता तथा प्रशस्त आचार्य प्राप्त हों। बालकों की शिक्षा में तीनों में से किस-किसको कितने समय तक अपना कर्त्तव्य निभाना है, इस विषय में स्वामी जी ने स्पष्ट निर्देश दे दिया है- ''जन्म से 5 वें वर्ष तक बालकों को माता, 6 वें से 8 वें वर्ष तक पिता शिक्षा करे और 9 वें वर्ष के आरा में द्विज अपनी सन्तानों का उपनयन करके विद्यायास के लिए गुरुकुल में भेज दें।''


         स्वामी जी ने बालक की शिक्षा में माता का भाग और दायित्व सबसे अधिक बताया है और यह उचित भी है। क्योंकि माता ही बालक को अपने गर्भ में धारण करती है, अतः गर्भकाल में माता के आचार-विचार का बालक पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अभिमन्यु द्वारा गर्भ निवासकाल में माता के सुने चक्रव्यूह-भेदन का रहस्य सीख जाना, महाभारत की प्रसिद्ध कथा है। जन्म प्राप्त करने के बाद भी काफी समय तक बालक माता के समपर्क में ही सबसे अधिक रहता है। स्वामी जी ने इस समय की सीमा 5 वर्ष निर्धारित की है। यह काल बालक के जीवन रूपी वृक्ष का अंकुर काल है। इसमें जो गुण, उसके अन्दर पड़ जायेंगे, वे बहुत गहरे होंगे, इसलिये माता का श्रेष्ठ होना अत्यन्त आवश्यक है। स्वामी जी लिखते हैं, ''वह कुल धन्य, वह सन्तान बड़ा भाग्यवान्। जिसके माता और पिता धार्मिक विद्वान् हों। जितना माता से सन्तानों को उपदेश और उपकार पहुँचता है, उतना किसी से नहीं। जैसे माता सन्तानों पर प्रेम (और) उनका हित करना चाहती है, उतना अन्य कोई नहीं करता; इसलिए (मातृमान्) अर्थात्


''प्रशस्ता धार्मिकी माता विद्यते यस्य स मातृमान्''


         धन्य वह माता है कि जो गर्भाधान से लेकर जब तक विद्या पूरी न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।'' अनेक महापुरुषों ने अपनी जीवनियों में माता का ऋण स्वीकार किया है और अपने समस्त गुणों को माता से प्राप्त हुआ बताया है।


         स्वामी जी की विशेषता यह है कि इन्होंने गर्भाधान के पूर्व मध्य और पश्चात्-तीनों समयों में माता-पिता की आचार-विचार समबन्धी शुद्धता का विधान किया है। वे लिखते हैं- ''माता और पिता को अति उचित है कि गर्भाधान के पूर्व, मध्य और पश्चात् मादक द्रव्य, मद्य दुर्गन्ध, रुक्ष, बुद्धिनाशक पदार्थों को छोड़ के, जो शान्ति, आरोग्य, बल, बुद्धि, पराक्रम और सुशीलता से सभयता को प्राप्त करे, वैसे घृत, दुग्ध, मिष्ट, अन्नपान आदि श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन करे कि जिससे रजस् वीर्य भी दोषों से रहित होकर अत्युत्तम गुण युक्त हों।'' इस प्रकार शुद्ध वीर्य तथा रजस् के संयोग से उत्पन्न सन्तान भी श्रेष्ठ गुणों वाली होगी। माता और पिता का यह शुद्ध आचार-विचार प्रकारान्तर से गर्भस्थ शिशु की शिक्षा ही है। स्वामी जी आगे लिखते हैं- ''बुद्धि, बल, रूप, आरोग्य, पराक्रम, शान्ति आदि गुणकारक द्रव्यों का ही सेवन स्त्री करती रहे, जब तक सन्तान का जन्म हो।'' ऐसा करने से सन्तान भी बुद्धि, बल, रूप, आरोग्य, पराक्रम आदि गुणों को धारण करेगी। यही उसके शिक्षित होने का दूसरा रूप है, जिसका दायित्व शुद्ध रूप से माता पर है, क्योंकि सन्तान गर्भस्थ दशा में उसी के रक्त-मांस से पुष्ट होती है।


          इसके बाद स्वामी जी ने जन्म प्राप्त सन्तान को शिक्षित करने में माता के कर्त्तव्यों का विस्तार से वर्णन किया है। माता के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा दो प्रकार की हो- (1) आचार-सबन्धी (2) प्रारमभिक अध्ययन-समबन्धी। आचार सबन्धी शिक्षा में माता सन्तान को उससे बड़ों के प्रति किये जाने वाले व्यवहार का उपदेश दे। बड़े, छोटे, माता, पिता, राजा, विद्वान् आदि से कैसे भाषण करना चाहिये, उनके पास किस प्रकार बैठना चाहिये, उनसे किस भाँति बरतना चाहिये- आदि बातों को निर्देश देना चाहिये। इससे बालक सर्वत्र प्रतिष्ठा योग्य बनेगा। दूसरे, माता सन्तान को जितेन्द्रिय, विद्याप्रिय तथा सत्संग प्रेमी बनाये, जिससे सन्तान व्यर्थ क्रीड़ा, रोदन, हास्य, लड़ाई, हर्ष, शोक, लोलुपता, ईर्ष्या द्वेषादि दुर्गुणों में न फँसे। माता सन्तान को सत्य भाषण, शौर्य, धैर्य, प्रसन्नवदन बनने वाले उपदेश दे। तीसरे, गुप्तांगों का स्पर्श आदि कुचेष्टाओं से उसे रोके और उसे सभय बनाये। प्रारमभिक अध्ययन-सबन्धी शिक्षा में माता सन्तान को शुद्ध उच्चारण की शिक्षा दे। ''माता बालक की जिह्वा जिस प्रकार कोमल होकर स्पष्ट उच्चारण कर सके, वैसा उपाय करे कि जो जिस वर्ण का स्थान, प्रयत्न अर्थात् 'प' इसका ओष्ठ स्थान और स्पष्ट प्रयत्न दोनों ओष्ठों को मिलाकर बोलना, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत अक्षरों को ठीक-ठीक बोल सकना। मधुर, गमभीर, सुन्दर, स्वर, अक्षर, मात्रा, पद, वाक्य, संहिता, अवसान भिन्न-भिन्न श्रवण होवे।'' शुद्ध उच्चारण का बहुत महत्त्व होता है।


         महाभाष्य का वचन है, ''माता ही सन्तान को वस्तुतः शुद्ध उच्चारण की कला सिखा सकती है, क्योंकि शैशव में उसी का समपर्क सबसे अधिक होता है।''


         इसके बाद सन्तान को देवनागरी अक्षरों का तथा अन्य देशीय भाषाओं के अक्षरों का अभयास कराये। अक्षराभयास कराने के उपरान्त माता सामाजिक पारिवारिक  आचार सिखाने वाले शास्त्रीय वचनों को कण्ठस्थ करावे। इन सबके अतिरिक्त माता सन्तान को भूत, प्रेत, माता, शीतला देवी, गण्डा, ताबीज आदि अन्धविश्वासपूर्ण, छलभरी तथा धोखाधड़ी की बातों से सचेत करे तथा उस पर उसे विश्वास न करने दे। स्वामी जी ने इन अन्धविश्वास की बातों का विस्तृत तथा रोचक शैली में वर्णन किया है। बाल्यावस्था में अन्धविश्वास-विरोधी संस्कार डाल देने से वे बद्धमूल हो जायेंगे। इसके अतिरिक्त माता का यह भी कर्त्तव्य है कि बालक को वीर्यरक्षा का महत्त्व बताये। वीर्यरक्षा का महत्त्व जिन शबदों में माता बताये, उनका भी स्वामी जी ने निर्देश कर दिया है। हम उन्हें अविकलभाव से उद्धृत करना उचित समझते हैं- ''देखो जिसके शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है, तब उसको आरोग्य, बुद्धि, बल, पराक्रम, बढ़ के बहुत सुख की प्राप्ति होती है। इसके रक्षण में यही रीति है कि विषयों की कथा, विषयी लोगों का संग, विषयों का ध्यान, स्त्री का दर्शन, एकान्त सेवन, समभाषण और स्पर्श आदि कर्म से ब्रह्मचारी लोग पृथक् रहकर उत्तम शिक्षा और पूर्ण विद्या को प्राप्त होवें। जिसके शरीर में वीर्य नहीं होता, वह नपुंसक, महाकुलक्षणी और जिसको प्रमेह रोग होता है, वह दुर्बल, निस्तेज, निर्बुद्धि, उत्साह, साहस, धैर्य, बल, पराक्रमादि गुणों से रहित होकर नष्ट हो जाता है। जो तुम लोग सुशिक्षा और विद्या के ग्रहण, वीर्य की रक्षा करने में इस समय चूकोगे तो पुनः इस जन्म में तुमको यह अमूल्य समय प्राप्त नहीं हो सकेगा। जब तक हम लोग गृह कर्मों के करने वाले जीते हैं, तभी तक तुमको विद्या-ग्रहण और शरीर का बल बढ़ाना चाहिये।''


          स्वामी जी ने पिता के दायित्व का स्पष्ट शबदों में पृथक् उल्लेख नहीं किया, परन्तु उनके इस निर्देश से कि 5 से 8 वर्ष तक की आयु तक सन्तान पिता से शिक्षण प्राप्त करे, पिता का कर्त्तव्य भी स्पष्ट हो जाता है। वस्तुतः अन्धविश्वास-विरोधी संस्कारों का निराकरण तथा ब्रह्मचर्य-महिमा का प्रतिपादन पिता अधिक सुचारु रूप से कर सकता है, अतः स्वामी जी ने अन्त में माता के साथ पिता का भी उल्लेख कर दिया है।


         स्वामी जी कहते हैं कि अध्ययन के विषय में लालन का कोई स्थान नहीं, वहाँ ताड़न ही अभीष्ट है। ''उन्हीं की सन्तान विद्वान्, सभय और सुशिक्षित होती हैं जो पढ़ाने में सन्तानों का लाड़न कभी नहीं करते, किन्तु ताडना ही करते रहते हैं।'' इस प्रकार स्वामी जी spare the rod and spoil the child के सिद्धान्त में विश्वास रखते थे। उन्होंने महाभाष्य का प्रमाण भी दिया है-


सामृतैः पाणिभिर्घ्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः।


लालनाश्रयिणो दोषास्ताडनाश्रयिणो गुणाः।।


         अर्थात् गुरुजन अमृतमय हाथों से ताड़ना करते हैं, विषाक्त हाथों से नहीं। भाव यह है कि गुरु की ताड़ना अमृत का प्रभाव करने वाली होती है, न कि विष का। लालन, प्रेम आदि से दुर्गुण पैदा होते हैं और ताड़न से शुभगुणों की प्रतिष्ठा होती है। ताड़ना का वस्तुतः अपना महत्त्व होता है। आजकल हम पबलिक स्कूलों की पढ़ाई को बहुत अच्छा समझते हैं। वहाँ ताड़न निषिद्ध नहीं है। स्वामी जी के इस विचार को अशुद्ध नहीं कहा जा सकता। परन्तु स्वामी जी यह लिखना न भूले कि ''माता, पिता तथा अध्यापक लोग, ईर्ष्या, द्वेष से ताड़ना न करें, किन्तु ऊपर से भय प्रदान तथा भीतर से कृपा दृष्टि रखें।'' कबीर का निम्नलिखित दोहा इसी तथ्य को स्पष्ट करता है-


गुरु कुहार सिष कुभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट।


अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।।


        इसके बाद स्वामी जी ने लिखा है कि आचार्य सत्याचरण की शिक्षा शिष्य को दे। सत्याचरण बहुत व्यापक शबद है। इस शबद में समस्त नैतिक तथा सामाजिक व्यवहार की मर्यादायें अन्तर्भूत हो जाती हैं। शिष्य को सच्चे अर्थों में सामाजिक व्यवहार की शिक्षा देने का दायित्व आचार्य पर है। आचार्य ही उसे सामाजिक दृष्टि से उपयोगी बना सकता है। इसके अतिरिक्त शिष्य को गमभीर ज्ञान की प्राप्ति तो आचार्य करायेगा ही, साथ ही  परा विद्या तथा अपरा विद्या में भी शिष्य को पारंगत करना, उसका कर्त्तव्य है।


         एक और महत्त्वपूर्ण बात की ओर संकेत करते हुए स्वामी जी ने तैत्तिरीय उपनिषद् का निम्नलिखित वचन उद्घृत किया है-


यान्यस्माकं सुचरितानि तानि


त्वयोपास्यानि नो इतराणि।


          अर्थात् शिष्य को उचित है कि वह माता, पिता तथा आचार्य के शुभ कार्यों का अनुकरण करे, अन्यों का नहीं। उक्त तीनों शिक्षक भी उसे यही उपदेश करें। मानव सुलभ त्रुटियाँ सभी में होती हैं। माता, पिता तथा आचार्य भी इसके अपवाद नहीं हो सकते, अतः शिष्य को अपने विकास में उपयोगी सब गुणों को अपने तीनों शिक्षकों से ग्रहण कर लेना चाहिये।


           स्वामी जी ने यह भी लिखा है कि सामान्य व्यवहार की छोटी-छोटी बातें भी यह शिक्षकत्रय शिष्य को बतायें। इन छोटी-छोटी बातों का सुन्दर संकलन मनु के निम्नलिखित श्लोक में है-


दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।


सत्यपूतां वदेद्वाचं, मनःपूतं समाचरेत्।।


           अन्त में स्वामी जी लिखते हैं कि अपनी सन्तान को तन, मन, धन से विद्या, धर्म, सयता और उत्तम शिक्षा-युक्त करना माता-पिता का कर्त्तव्य कर्म, परम धर्म तथा कीर्ति का काम है।


चाणक्य नीति के निम्नलिखीत श्लोक में माता-पिता के उक्त दायित्व का वर्णन किया गया है-


माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।


न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।


         इस प्रकार सत्यार्थप्रकाश के द्वितीय समुल्लास में स्वामी जी ने शिक्षा समबन्धी मौलिक बातों पर संक्षेप में प्रकाश डाला है। उनकी स्थापनायें शास्त्रानुमोदित होने के साथ-साथ उपयोगितावादी, व्यावहारिक कसौटी पर भी खरी उतरती है।


 



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