कुछ मुर्ख हम आर्यों को सत्य मार्ग से कभी दूर नहीं कर सकते।

कुछ मुर्ख हम आर्यों को सत्य मार्ग से कभी दूर नहीं कर सकते।




आज प्रातकाल: फेसबुक पर कुछ अज्ञानी लोगों की करतूत देखी। उन्होंने स्वामी दयानंद के चित्र पर कुछ फोटोशॉप कर ऊटपटांग सा बनाने का प्रयास किया। हमारे कुछ आर्य भाई उसे देख आवेश में आ गये।




मेरे मन में केवल एक विचार आया। अगर स्वामी दयानंद आज होते तो क्या करते?




इसके उत्तर स्वामी जी के जीवन चरित्र में पूना प्रवास के समय का मिलता है। स्वामी जी के उपदेशों के प्रभाव से पूना के कुछ अज्ञानी लोगों में खलबली मच गई। उन्होंने स्वामी जी के विरोध में एक गधे को गेरुए रंग से सजाकर, उस पर काषाय रंग की झूल डालकर गर्दभानन्द सरस्वती लिख दिया। इसके बाद गर्दभानन्द की जय के नारे लगाते हुए जुलुस निकाला। स्वामी जी ने जब यह जुलुस देखा तो मुस्कुराये और बोले- "नकली गर्दभानन्द के साथ तो ऐसा ही होना चाहिये।"

स्वामी जी की स्थितप्रज्ञता एवं आवेश में न आने के गुण का उनका उपदेश सुनने आये दर्शकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।




धन्य हैं वीतराग सन्यासी जो परनिंदा से अपने आपको सुरक्षित रखे हुए थे।




आज सभी आर्यों को स्वामी दयानंद के जीवन की इस प्रसंग से शिक्षा लेनी चाहिए की परनिंदा में अपने बहुमूल्य और कीमती समय को न लगाकर तप, स्वाध्याय और ईश्वर उपासना से जीवन का उद्धार करे। स्वामी दयानंद के जीवन के इस सन्देश को आर्यों को प्रचार करने की प्रबल आवश्यकता हैं तभी देश, जाति और धर्म का कल्याण होगा।




सन्देश-




पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती ।

यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥
-- ऋग्वेद १ - ३ - १०

भावार्थ -- सब मनुष्यों को चाहिये कि वे ईश्वर की प्रार्थना और अपने पुरुषार्थ से सत्य विद्या और सत्य वचनयुक्त कामों में कुशल और सब के उपकार करनेवाली वाणी को प्राप्त रहें , यह ईश्वर का उपदेश है ॥


- महर्षि दयानन्द सरस्वतीकुछ मुर्ख हम आर्यों को सत्य मार्ग से कभी दूर नहीं कर सकते।




आज प्रातकाल: फेसबुक पर कुछ अज्ञानी लोगों की करतूत देखी। उन्होंने स्वामी दयानंद के चित्र पर कुछ फोटोशॉप कर ऊटपटांग सा बनाने का प्रयास किया। हमारे कुछ आर्य भाई उसे देख आवेश में आ गये।




मेरे मन में केवल एक विचार आया। अगर स्वामी दयानंद आज होते तो क्या करते?




इसके उत्तर स्वामी जी के जीवन चरित्र में पूना प्रवास के समय का मिलता है। स्वामी जी के उपदेशों के प्रभाव से पूना के कुछ अज्ञानी लोगों में खलबली मच गई। उन्होंने स्वामी जी के विरोध में एक गधे को गेरुए रंग से सजाकर, उस पर काषाय रंग की झूल डालकर गर्दभानन्द सरस्वती लिख दिया। इसके बाद गर्दभानन्द की जय के नारे लगाते हुए जुलुस निकाला। स्वामी जी ने जब यह जुलुस देखा तो मुस्कुराये और बोले- "नकली गर्दभानन्द के साथ तो ऐसा ही होना चाहिये।"

स्वामी जी की स्थितप्रज्ञता एवं आवेश में न आने के गुण का उनका उपदेश सुनने आये दर्शकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।




धन्य हैं वीतराग सन्यासी जो परनिंदा से अपने आपको सुरक्षित रखे हुए थे।




आज सभी आर्यों को स्वामी दयानंद के जीवन की इस प्रसंग से शिक्षा लेनी चाहिए की परनिंदा में अपने बहुमूल्य और कीमती समय को न लगाकर तप, स्वाध्याय और ईश्वर उपासना से जीवन का उद्धार करे। स्वामी दयानंद के जीवन के इस सन्देश को आर्यों को प्रचार करने की प्रबल आवश्यकता हैं तभी देश, जाति और धर्म का कल्याण होगा।




सन्देश-




पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती ।

यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥
-- ऋग्वेद १ - ३ - १०

भावार्थ -- सब मनुष्यों को चाहिये कि वे ईश्वर की प्रार्थना और अपने पुरुषार्थ से सत्य विद्या और सत्य वचनयुक्त कामों में कुशल और सब के उपकार करनेवाली वाणी को प्राप्त रहें , यह ईश्वर का उपदेश है ॥


- महर्षि दयानन्द सरस्वती


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