कथनी और करनी का अंतर

कथनी और करनी का अंतर

बुल्लेशाह के नाम से पंजाब के प्रसिद्द संत थे। युवावस्था में उनका मन वैराग्यवान हो गया। मुसलमानों में ऊंच-नीच, जात-पात, छुआ-छूत के झगड़े देखकर उनका मन उचाट हो गया। बुल्लेशाह इस क्रूर व्यवहार के सर्वथा विरुद्ध थे। उन्होंने अपना अधिकांश समय प्रभु  भक्ति एवं उपदेश में लगाना आरम्भ कर दिया। उनका उपदेश ग्रहण करने मुसलमानों की छोटी जातियां भी आती थी। बुल्लेशाह का जन्म मुसलमानों में सबसे ऊँचा समझे जाने वाले सैय्यद जो हजरत मुहम्मद साहिब का कुल था, उसमें हुआ था। लोगों को  बुल्लेशाह की छोटी जाति वालों से नजदीकियां पसंद न थी। एक बार बुल्लेशाह के सम्बन्धियों ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि वह नीच लोगों की संगत न करे। उन्होंने बुल्लेशाह से कहा की श्रेष्ठ सैय्यद कुल में पैदा होकर उनका नीचे लोगों से साथ सम्बन्ध नहीं होना चाहिए।

बुल्लेशाह ने कहा- "क्या किया जाये? मैं तो इन्ही लोगों के साथ रहने को विवश हूँ जिन को आप नीच बता रहे हो। मैं तो इनमें कोई दोष नहीं देखता और तुम जिनको श्रेष्ठ लोग समझ रहे हो, जो नियमपूर्वक नमाज़ पढ़ते हैं, बात बात में इस्लाम और क़ुरान का नाम लेते हैं, जो फरिश्तों जैसी भाषा में बातें करते हैं, उनके तो दर्शन से भी मुझे डर लगता है। क्यूंकि उनके विचार और उनके कर्म सब प्रकार से निंदनीय हैं। वे केवल बात बनाते हैं।"

बुल्लेशाह ने इस वाक्या में कथनी और करनी के अंतर को व्यवहारिक रूप से स्पष्ट किया हैं। वेद भी परमात्मा के स्मरण के साथ श्रेष्ठ कर्म करने का सुन्दर सन्देश देते हैं। ऋग्वेद के 7/32/13 मंत्र में लिखा है कि हे मनुष्य तुम परमात्मा के लिए की जाने वाली श्रेष्ठ, सुन्दर, यथार्थ, उदारतसहित, नम्रताभावपूर्ण, प्रेम पूर्वक स्तुति को अपने धर्म कार्य में समर्पित कर दो। अर्थात आप जितने सुन्दर रूप से परमात्मा कि स्तुति करते है, उतने ही सुन्दर आपके कर्म होने चाहिए। क्यूंकि वेद कहते हैं, जिसके कर्म परमात्मा में स्थिर हो जाते हैं, उसी की आत्मा बंधनों से मुक्त हो जाती हैं।

आज संसार में अनेकों गुरु, ग्रन्थि, मौलवी और पादरी आदि ईश्वर का सन्देश देने में लगे हुए हैं। मगर संसार में चारों और दुःख, दरिद्रता, लालच, अभिमान, अत्याचार,शोषण आदि न केवल स्पष्ट दीखता हैं अपितु उसकी दिनों दिन वृद्धि भी हो रही हैं। इसका कारण उनकी कथनी और करनी में अंतर हैं। उनके उपदेश सुनने वालो के कर्मों में उनका प्रभाव न के बराबर होना हैं। जब तक मनुष्य ईश्वर को समर्पित कर क्रम नहीं करेगा तब तक दुखों के बंधन से छुट नहीं पायेगा।


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