कर्तव्यपरायण

कर्तव्यपरायण



      ५. लाट साहब (गवर्नर महोदय-पंजाब, लाहौर) की कोठी के बाहर सिपाही वर्दी धारण किये, संगीन और निशान झण्डा फहराये ड्यूटी पर खड़ा है। ऐसा सावधान खड़ा हुआ है कि बात भी करता है-तो न गरदन मोड़ता है, न हाथ उठाता है । जिह्वा उसकी बोल रही है ऐसा शरीर ड्यूटी पर अकड़ा हुआ है और आँख सामने दृष्टि रख रही है। पीछे का आदमी बात करता है-तो भी गरदन नहीं मोड़ता । ऐसे ही उत्तर देता है । उसके सामने से उत्तर और दक्षिण से, दाहिने और बायें से प्रतिक्षण साइकल टांगे, मोटरें चल रही हैं। वह जरा दृष्टि झुकाए तो पता नहीं क्या का क्या हो जाए। इसलिए वह सब काम गौरण रूप में करता हैपर मुख्य अपनी ड्यूटी को रखता है। प्रभु-भक्त भी संसार में ऐसे सिपाही की भीति कार्य व्यवहार करता है। उसकी दृष्टि, उसका मन प्रभु में रहता है और स्वयं सब व्यवहार गौण रूप से करता जाता है।


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