कैसे करें पितरों का श्राद्ध

कैसे करें पितरों का श्राद्ध


      एक सभ्य सुशिक्षित समाज की परम्परा रही है कि किसी धर्मात्मा व सज्जन परुष की बात को सदैव विश्वनीय माना जाता हैबुद्धि, विवेकसम्पन्न मनुष्य किसी ऐसे व्यक्ति की बात पर भरोसा नहीं कर पाते. जो सच के साथ झठ भी बोलता रहता हो। इन सब बातों को ध्यान में रखकर देखें तो समाज में सदैव धर्मनिष्ठ सदाचारी विद्वानों की बात को बडी गम्भीरता से सुना व माना जाता है। दुर्भाग्य से भारतीय जन मानस आज इससे उलटा व्यवहार कर रहा है। धर्म. कर्म और विद्या व्यवहार के मामले आज बद्धि विरुद्ध अन्धविश्वास देश में खुब फल-फल रहा है। लगता है समझदार कहे जाने वाले लोग धर्म, कर्म और विद्या व्यवहार के सम्बन्ध में परम्परा से हटकर कछ सोचने-समझने को तैयार नहीं हैं। भारत की जनता अन्धविश्वासों में जीवन बिताने में ही आनन्ट मानने लगी है। धार्मिक कहलाने वाले लोगों की बात करें तो वे धर्म-कर्म व आत्मा-परमात्मा के सम्बन्ध में अपनी स्वयं की बुद्धि का प्रयोग ही नहीं करना चाहते। दूसरे कछ लोग हैं कि वे धर्म-कर्म को तर्क की तलवार लेकर इनके टुकड़े-टुकडे करके धर्म और आत्मा-परमात्मा का नाम निशान ही मिटा देना चाहते हैं। सच में ये दोनों बातें बुद्धि-विज्ञान के विरुद्ध है। समझदारी इसी में है कि हम बिना तर्क-बद्धि के जीवन में कछ भी स्वीकार न करें तथा तर्क का प्रयोग हार-जीत की भावना से न करके सत्य तक पहुँचने की भावना से करें। ऐसी सन्तुलित सोच वाला मनुष्य जीवन के पथ पर न तो स्वयं भटकता है और न किसी को भटकने देता है। 


      हम चर्चा कर रहे थे कि पितरों का श्राद्ध कैसे करें? यहाँ दो शब्दों का अर्थ समझने की आवश्यकता है। पहला शब्द है पितर और दूसरो है श्राद्ध। हिन्दी भाषा के शब्द बहुधा संस्कृत से लिये हैं। संस्कृत में पिता के लिये पितृ व माता के लिए मातृ शब्द का प्रयोग इतना प्रचलित है कि हिन्दी में भी मातभाषा और पितृ-सत्तात्मक जैसे शब्दों का प्रयोग खूब होता है। श्रावण मास के प्रथम पक्ष को श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष कहा जाता है। पता नहीं कैसे हमारे मन-मस्तिष्क में ये बात बिठा दी गई है कि पितर मरे हुए पूर्वजों का कहते हैं। पितर शब्द का सामान्यतया अर्थ होता है- 'पालन करने वाले' और बहुधा यह जीवित माता-पिता व दादी-दादा के लिये प्रयुक्त होता हैपितृ शब्द का अर्थ केवल मृत माता-पिता और दादी-दादा के लिए ही मानना किसी दृष्टि से उचित नहीं। सामान्य व्यवहार की दृष्टि से से देखें तो जीवित माता-पिता की सेवा-सत्कार करना सदा अच्छा माना जाता है। मरे बाद उनके लिए कुछ भी करना सदैव असम्भव है। मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा की कर्म-फल व्यवस्था में चला जाता है। मृत पुरुष या स्त्री के शव को विधिपूर्वक 'भस्मान्तं शरीरम' के वेदादेशानुसार जला देने को 'अन्तिम संस्कार' इसीलिए कहते हैं क्योंकि इसके बाद इस मृत स्त्री-पुरुष के प्रति हमारा कोई भी कर्तव्य शेष नहीं, उसके साथ हमारा कोई सम्बन्ध शेष नहीं रहता


      श्राद्ध' शब्द का सीधा और सरल अर्थ हैश्रद्धापूर्वक'। श्रद्धा शब्द श्रत+धा से मिलकर बना है। श्रत् का अर्थ है सत्य और धा का आशय धारण करना। सत्य को धारण करके जीवन व्यवहार में स्वीकार करने की हमारी आन्तरिक शक्ति श्रद्धा कहलाती है। किसी की उल्टी-सीघी बात को बिना सोचे-विचारे मान लेने को 'अन्ध श्रद्धा' कहा जाता है। हमें अन्ध श्रद्धा से बचना है, सत्य को स्वीकार करने से पहले प्रश्नोत्तर व शंका-समाधान पूर्वक ठोक-बजाकर जाँच लो, परख लो। हम सुनते आये हैं- 'सांच को आंच कहाँ' फिर प्रश्नोत्तर व तर्क-वितर्क करने में संकोच कैसा? रही बात श्राद्ध की शत्, सत्यम् दधाति यया क्रियया सा श्रद्धा, श्रद्धया श्रुत् क्रियते तत् श्राद्धम्।' अर्थात् जिस क्रिया से सत्य को ग्रहण-धारण किया जाये, उसको श्रद्धा और जो श्रद्धापूर्वक कर्म किया जाये वो श्राद्ध कहलाता है। इन दोनों शब्दों के सरल अर्थ जान लेने के बाद श्राद्ध के नाम पर जो कुछ हमारे समाज में चल रहा है वह श्राद्ध शब्द के साथ मेल खाता हुआ नहीं दिखता। कई वर्ष पूर्व हमें छोड़कर देह त्यागकर जा चुके माता-पिता आदि पूर्वजों को भी भोजन देने के नाम पर पण्डितों व कौआ आदि पक्षियों को मिष्ठान्न पकवान खिलाना न तो पितर शब्द के साथ मेल खाता है और न श्राद्ध के साथ। पण्डितों को और पक्षियों को भोजन देना बहुत पुण्य की बात है लेकिन निराधार परम्पराएं बनाकर अन्धविश्वास को बढ़ावा देना न पण्डितों के लिये उचित है और न बुद्धिमान् गृहस्थियों के लिये। भला मृत व्यक्तियों के लिये वर्षों तक वर्ष में एक दिन उन्हें भोजन देकर तृप्त या सन्तुष्ट करने के लिये किसी अन्य पुरुष व प्राणी को भोजन देना कैसे उचित माना जा सकता है? इतना तो सब जानते और मानते हैं कि किसी भूखे व्यक्ति का पेट भरना हो तो उसे ही भोजन कराना होगा न कि पास बैठे किसी दूसरे व्यक्ति को। एक रोगी बालक कड़ी औषधि न ले रहा हो तो उसके दूसरे भाई व बहन को वह औषधी देकर रोगी बालक के स्वस्थ होने की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता तो श्राद्ध के नाम पर यह गोरख धंधा क्यों? इसके बारे में किसी न किसी को तो कभी न कभी सोचना पड़ेगा


      सच यह है कि श्राद्ध और तर्पण जीवित माता-पिता, दादी-दादा आदि बड़ों का प्रतिदिन करना चाहिये। जीवित माता-पिता की श्रद्धापूर्वक सेवा करके उन्हें सन्तुष्ट करना सबकी समझ में आने वाली बात है जिन्होंने हमें जीवन दिया. हमारा लालन-पालन किया. हमें पढ़ाया-लिखाया, हमारे लिये अपना जीवन लगा दिया, उन माता-पिता आदि की तन-मन-धन से सेवा करना संसार का सबसे बड़ा सौभाग्य है। मैंने पिछले श्रीगंगानगर वास के समय एक परिवार ऐसा देखा जिसे मैं जीवन भर नहीं भूल सकता। सुखाडिया सर्किल के दक्षिणी सड़क पर पश्चिम की ओर कुछ चलकर दक्षिणा दिशा स्थिति किसी गली में एक धुलिया परिवार में मैं यज्ञ कराने गया। पश्चिम में एक वृद्धा माता जिन्हें दीखना बन्द हो गया था, वह एक चारपाई पर बैठी केवल एक ही वाक्य रट रही थी"भगवान् मेरे बच्चों को सुखी रखना।" घर में प्रवेश करने से लेकर यज्ञ करके भोजन खाने तथा घर से निकलने तक मैंने उस माँ के मुंह से निरन्तर यही एक वाक्य सुना। मैंने उस माँ से थोड़ी बातें की तो उसने बताया कि परिवार के सब लोग मेरी बहुत सेवा _ करते हैं। मैंने उस भाग्यशाली परिवार से कहा कि चाहे किसी के पास धन-दौलत कितनी ही हो लेकिन सुख-शान्ति और सौभाग्य में आपकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। इसे कहते हैं श्राद्ध, ऐसा होता हैश्राद्ध! माता पिता की श्रद्धापूर्वक सेवा करो ये सच्चा श्राद्ध है। इसके साथ सच्चे, निर्लोभी, धर्मात्मा, विद्वान् ब्राह्मण को भोजन व पक्षी आदि प्राणियों को दाना आदि देते रहें, जीवन पवित्र और स्वर्ग बन जायेगा |


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