ईश्वर की सर्वव्यापकता

ईश्वर की सर्वव्यापकता

ईशोपनिषद के मंत्र ईशावास्यमिदं में सर्वव्यापक ईश्वर के विषय में लिखा हैं की इस जड़ चेतन दोनों प्रकार के जगत में जो कुछ भी हैं उन सभी में ईश्वर व्यापक हैं। एक उर्दू शायर ने इसी भाव को बड़ी गंभीरता से लिखा हैं 

"तू हर जर्रे में पिन्हा हैं, जहाँ तुझ में समाया हैं, मुक़य्यद इक जगह या रब? तू हरगिज हो नहीं सकता।"

ईश्वर की सर्वव्यापकता के लिए बड़ी ही प्रसिद्ध आख्यायिका हैं की एक दिन एक दिन एक शराबी शराब की बोतल लेकर खुदा के घर-मस्जिद में पहुँच गया और शराब पीने लगा। इतने में मुल्ला जी दौड़े आये और बोले कम्भख्त नशे में पागल हो गया हैं? जरा इतना तो होश करो की यह खुदा का घर हैं, कम से कम खुदा के नाम पर मस्जिद में तो शराब मत पीओ! शराबी नशे में बात पते की कह गया.
"नासेह! शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर या वो जगह बता दे जहाँ खुदा न हो। "
मुल्ला जी से शराबी का उत्तर नहीं बना परन्तु उसका उत्तर यह हैं
"ऐ रिन्द! पी शराब जहाँ चाहे बेखतर, दिल में खुदा नहीं तो कहीं भी खुदा नहीं। "
ईश्वर क्यूंकि सर्वव्यापक हैं इसलिए मस्जिद में भी हैं,मस्जिद के बाहर भी हैं और शराबी में भी हैं।

अंत में वेदों का यही सन्देश हैं की जो व्यक्ति सर्वव्यापक ईश्वर की सत्ता में विश्वास करेगा वह कभी पाप नहीं करेगा।


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