"दयालु दयानंद"

स्वामी जी का नाम दया हैं , इससे भी बड़े ये दयालु थे। स्वामी जी के जीवन में अनेक घटनाएँ हमें सुनने को मिलती हैं जिनसे यह सिद्ध होता हैं कि स्वामी जी कितने बड़े दयालु थे। बुलंदशहर के कर्णवास में जब ठाकुर कर्ण सिंह ने तलवार से जब स्वामी जी पर आक्रमण किया तब स्वामी जी ने उसका हाथ पकड़ कर तलवार छीन ली और उससे कहा कि क्षत्रिय कि तलवार अगर म्यान से निकलती हैं तो शत्रु का वध कर ही वापिस लौटती हैं। स्वामी जी के शिष्यों ने उन्हें स्थानीय दरोगा से इस घटना कि शिकायत करने को कहा परन्तु स्वामी जी ने दयालुता दिखाते हुए ऐसा करने से मना कर दिया।
      जीवन जी गोसाईं ने बलदेव सिंह के द्वारा स्वामी जी को विष दिलाने का उपक्रम किया परन्तु उसके विरुद्ध भी स्वामीजी महाराज ने कोई कार्यवाही नहीं करी। अनूपशहर में एक व्यक्ति ने पान में विष दे दिया था।  स्वामी जी ने विष को यौगिक क्रिया से निकाल दिया परन्तु उस व्यक्ति को मना कर दिया। जब उस शहर के तहसीलदार सैय्यद मुहम्मद जो स्वामी जी का भक्त था ने उस व्यक्ति को हवालात में बंद कर दिया।जैसे ही स्वामी जी को इस घटना के विषय में पता चला तो स्वामी जी ने उसे हवालात से मुक्त करा दिया और कहा कि "मैं किसी व्यक्ति को कैद कराने नहीं अपितु मुक्त करवाने आया हूँ।"
धन्य हैं दयालु देव दयानंद।
कुछ पाठकों के मन में शंका होगी कि क्या अपराधी को दंड न दिलाना दयालुता हैं ?
इस शंका के समाधान के लिए हमें स्वामी जी के जीवन चरित्र के दर्शन करने पड़ेगे।
स्वामी जी द्वारा स्थापित वैदिक यंत्रालय में मुंशी भक्तावर सिंह ने कुछ रूपये का प्रेस में गबन कर दिया।  तब स्वामी जी ने सेठ कालीचरण को पत्र लिखाकर सारा हिसाब समझ कर पहले पंचायत करके फैसला करने को कहा फिर उससे भी न सुलझे तब अदालत में मामला ले जाने को कहा। स्वामी जी इस पत्र में आगे लिखते हैं "जो यह केवल हमारा ही धन होता तो कुछ परवाह न थी , परन्तु यह सब संसार का धन हैं। "
 
स्वामी जी अगर कोई अपराधी उनके व्यक्तित्व पर आक्रमण करता अथवा उनकी व्यक्तिगत संपत्ति का अपहरण करता तब तो दया का दरिया बहा देते। जब कोई सार्वजानिक जीवन के सुंदर सिद्धांतों को समाप्त करने कि कुचेष्टा करता अथवा सार्वजानिक संपत्ति को स्वाधिकार में करने का प्रयास करता तब उसे दण्डित करने से पीछे नहीं हटते थे। ऐसे व्यक्ति को सजा दिलाना भी दयालुता हैं क्यूंकि अगर ऐसे व्यक्ति को दंड न दिलाया जाये तो वह व्यक्ति उग्र आघात करने पर उतारू हो जायेगा। वह व्यक्ति अपने उग्र पापों का फल जन्म- जन्मान्तरों तक भोगेगा। इसलिए ऐसे व्यक्ति को दंड देना उस व्यक्ति का हित करने के समान हैं इससे वह जन्मों तक दुखी होने से बचेगा। दंड में कैसी सुन्दर दयालुता हैं। इसीलिए स्वामी दयानंद जी का "दयालु दयानंद " नाम सार्थक हैं।
डॉ विवेक आर्य 


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