भगवान भुवन

भगवान भुवन भास्कर पूर्वोत्तर की धरा पर उतर चुके हैं.  उनकी स्वर्ण रश्मियॉ नगाधिराज हिमालय के दुग्ध धवल उत्तुंग  शिखरों से टकरा कर परावर्तित होकर पूरे प्रभामण्डल को स्वर्णिम बना दे रही हैं. यही रश्मियॉ जब दूर दूर तक हरित सागर से फैले हुए विस्तृत चाय बागानों पर पड़ती हैं तो प्रभामण्डल हरिताभ हो उठता है. 
        सूर्यदेव अब शनै : शनै: पश्चिम की ओर प्रस्थान कर रहे हैं. उनकी आभा सुप्त लोगों को प्रभाती सुनाती हुई पल दर पल आगे बढ़ रही है. 
          सूर्य रश्मियॉ कह रही हैं कि हे मानव  ! रात्रि व्यतीत हो चुकी है. सारी कायनात जग चुकी है. अत: तुम भी आलस त्यागो, उठो , और कर्मपथ पर अग्रसर हो. 


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