भारत की बेटी



भारत की बेटी



जननी नाम से पवित्र, दूसरा कौनसा है नाम |


माँ नाम से निर्मल, कौनसा है दूसरा है नाम ||


       आज की किशोरी ही भविष्य की आधारशिला है | संतान उत्पत्ति की अर्थात श्रेष्ट संतान उत्पत्ति की और राष्ट्र गौरव की, क्यों की जब कोई युवती स्वयं निर्णय लेने लग जाती है अर्थात यह आयु १६ से १८ की होती है और इसी आयु में वह निर्णय लेनी की क्षमता प्राप्त करती है | यही से उसके भावी संतान का भविष्य शुरू हो जाता है | यही संतान उत्पत्ति का विज्ञान है | इतिहास इस बात का साक्षी है – शिवाजी,श्री कृष्ण, श्री राम, प्रलहाद , रावण, पांडव, आदि की | ऐसी हजारो बेटियों ने राष्ट्र रक्षक, राष्ट्र निर्माण, तो एक  ओर  दुष्ट,विनाशक            संतान को  उत्तपन किया | जिस स्त्री में संतान गर्भ में आने से पहले ही अर्थात अपनी युवा अवस्था में स्त्री जिस विचारों का चिंतन करती रहेंगी वहाँ पर उसी विचारों से प्रभावित वैसी ही विचारों वाली आत्मा का गर्भ में प्रवेश होंगा और वह संतान जन्मजात उसी प्रवृति का पोषक होंगी | वह चाहे तो रावण जैसी संतान को भी जन्म दे सकती है और चाहे तो कृष्ण जैसी योद्धा संतान को भी उत्तपन कर राष्ट्र रक्षा या राष्ट्र निर्माण कर देश की सेवा कर  सकती है | घर बैठे नारी समाज की, देश की सेवा कर सकती है | पर इसके लिए आवश्यकता है तपस्या – दूसरों के प्रति त्याग और सेवा ही तपस्या है | पर दुःख की बात है की ऐसे जीवन का महत्व आज नहीं रहा | ऐसे जीवन को आज निचले स्तर से देखा जाता है |


      आज पाश्चात्य सभ्यता हर क्षण इतनी हावी हो रही है, की हमारे संस्कार प्राय: उनके समक्ष नष्ट हो रहे है | आज की शिक्षा, आज के रहन सहन, आज के विचार, हमारे संस्कार रपी धरोवर को नष्ट करते चले जा रहे है | भविष्य के इस आधारशिला  किशोरी के भटकते हुए जीवन का कौन जिम्मेदार है ? उसके ओर उठने वाली पाशविक दृष्टी का कौन जिम्मेदार है ? घर से भागकर प्रेमविवाह करने का कौन जिम्मेदार है ? उसके बिना विवाह माँ बनाने का कौन जिम्मेदार है ? उसके मर्यादाहीन होने का कौन जिम्मेदार है ? उसके अभिभावक व वह स्वयं ?


      हम निश्चित कह सकते है, युवा पीढ़ी के अनुशासनहीनता के लिए, तपस्या हिन् जीवन के लिए, भोगमय जीवन के लिए जिम्मेदार उसकी पूर्व पीढ़ी अर्थात माता-पिता ही है | हम इसे सिद्ध भी कर सकते है | नारी गर्भ से संतान इस धरती पर आती है, पर इसके लिए उसे किसी योगदान की आवश्यकता होती है ओर वह योगदान देने वाले होते है उसके अपने माता-पिता | उच्चा संस्कारो के बिज को संतानों में अंकुरित करना होता है | अंकुरित करने के लिए किसे न किसे खाद, जल ओर अन्य पोषक तत्व तो देने ही होंगे, तभी तो उच्चा संस्कारो का भिज अंकुरित होंगा | इस आधुनिकता को देखते हुए यह बड़ा जटिल लगता है, क्यों की तप करना कोई साधारण कार्य नहीं है | यह कोई एक दो दिन में होनेवाला चमत्कार भी नहीं है | पीढ़िय बिगड़ने में लगी है, तो पीढ़िय सुधरने में भी लगेंगी | इसलिए आज के युवा पीढ़ी को माता-पिता से संस्कार न भी मिले हो, तो कोई बात नहीं, तो उनका कोई दोष भी नहीं है यह नष्टता पीढियों से चली आ रही है |


      अब तो इसे अंकुरित करने की जिज्ञासा युवा पीढ़ी में होनी चाइये | निरंतर जागृति से संस्कार रूपी बिज अंकुरित होकर एक दिन वट वृक्ष निश्चित होंगा | सीता, सावित्री, मदालसा, गार्गी, सुलभा, मैत्री, अरुंधती, अन्नपुर्णा, संध्या, अनुसया, शाण्डिली, दमयंती, रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई आदि हजारो युवतियों, नारियो ज्ञान की ओर पवित्रता की उन उचाइयो को छु लिया था | इन बेटियों के जीवन से यह बात भी झूठी सभीत होती है, की स्त्रियों को पड़ने का अधिकार नहीं था | क्यों की मदालसा, सुलभा, गार्गी आदि उच्चस्तरीय पंडित, विद्वान, ब्रह्मज्ञानी थी जिन्हें शास्त्रार्थ में हराना जनक जैसे विद्वान को भी अशक्य था |


       वैदिक संस्कृति के अनुसार स्त्रीजीवन की महानता माता का पद प्राप्त करने में है, ओर महाभाग्यशाली होना है ज्ञानी, योद्धा, दानी, त्यागी, तपस्वी, पुत्र-पुत्री की माता कहलाना में | रोटी बनाना, व्यापार करना, नौकरी करना, घर चलाना अलग बात है और औरो के लिए जीना, संसार के कल्याण की चाह रखकर संतान का निर्माण, राष्ट्र निर्माण, समाज निर्माण, धर्मं  रक्षा करना अलग बात है | एक नारी प्रसव पीड़ा सहन करती है, अगर उस प्रसव पीड़ा से राष्ट्र उन्नति नहीं हुई, लोक कल्याण नहीं हुआ,अन्याय नष्ट नहीं हुवा, आभाव दूर नहीं हुवा, अज्ञानियों का अज्ञान दूर नहीं हुवा, दुखियो को दुःख दूर नहीं हुवा, तो फिर क्या हुवा ? किस काम का है उत्सव ? किस काम का हुवा यह जन्म ? प्रसव पीड़ा तो दूर हुई पर नई पीड़ा बड गयी अपनी भी ओर दूसरो की भी |


      आचार विचार जहा नष्ट होते है, संतान वहा भ्रष्ट होती है | संतानों के भ्रष्ट होने से संस्कार नष्ट हो जाते है | संस्कारो के नष्ट होने से, राष्ट्र गरिमा खो देता है |राष्ट्र गरिमा खो जाने से मनुष्य अपनी  पहचान भी खो जाती है


नाम मात्र ही माँ न बन, त्याग प्रेम से बने तू माता |


सुन भारत की बेटी, पवित्रता से बने तू माता ||


शरीर से तू माँ न बन, नारीत्व से बने तू माता |


सुन भारत की बेटी, संस्कारो से बने तू माता ||


 


दूध पिलाने से माँ न बन, व्रत स्वाध्याय से बने तू माता |


सुन भारत की बेटी, प्रार्थनाओ से बने तू माता ||


भोजन वस्त्रों से ही माँ न बन, मातृत्व से बने तू माता |


सुन भारत की बेटी, आचरण से बने तू माता ||


 


पढने पढाने से ही माँ न बन, सुप्रवृतियो से बने तू माता |


सुन भारत की बेटी, तपस्या से बने तू माता ||


पाशविक तृष्णा से ही माँ न बन, सु विचारों से बने तू माता |


सुन भारत की बेटी, संयम से बने तू  माता ||


 


अधर्म से तू माँ न बन, धर्मं से बने तू माता |


सुन भारत की बेटी, सतीत्व से बने तू माता ||


अपने लिए माँ न बन, विश्व सेवा के लिए बने तू माता |


सुन भारत की बेटी, जाबाज़ विरो से बने तू माता ||


 




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