बस न्याय-व्यवस्था के साथ अन्याय न हो

बस न्याय-व्यवस्था के साथ अन्याय न हो


    महर्षि मनु द्वारा प्रदत्त भारत की न्याय प्रणाली विश्व की सबसे पुरानी प्रणालियों में से एक हैं हमारे धर्मिक ग्रंथों से लेकर प्राचीन किस्से कहानियों में न्याय के बडे-बडे उल्लेख मिलते हैंआरम्भ से हमारे भारतीय व्यवस्थाकारों ने समाज एवं मनुष्य को व्यवस्थित और नियंत्रित रखने के लिए जिन मान्य परंपराओं, प्रथाओं तथा विधानों को लिपिबद्ध किया है, उन्हीं नियमों को विधि और कानून की संज्ञा प्रदान की गयी। समय के साथ न्याय व्यवस्था नाम के साथ बदलती रही और आज भारत में न्याय का स्रोत हमारा संविधान है।


    लेकिन आज न्याय और संविधान पर कुछ प्रश्नचिन्ह लगते दिखाई दे रहे हैं। सबने देखा, अभी हाल ही में हरयाणा में चुनाव नतीजे आने के बाद एक बार फिर न्याय व्यवस्था पर सवाल उठा है। जननायक जनता पार्टी के मुखिया दुष्यंत चौटाला के भाजपा के समर्थन की घोषणा करने के २४ घण्टों के अंदर शिक्षक भर्ती घोटाले में दुष्यंत के सजायाफ्ता पिता अजय चौटाला को तिहाड़ जेल से छुट्टी मिल गई है। हालांकि कहा जा रहा है कि फरलो देने का विधान तो कानून में है लेकिन उसकी भी अहम शर्त यही है कि कैदी का आचरण सही रहा हो तो फरलो दी जा सकती है पर यह फरलो अजय चौटाला को ही यकायक क्यों दी गयी एक आम नागरिक यह बखूबी समझ रहा है।


    न्यायपालिका परेशान लोगों के लिए सांत्वना का माध्यम है, निराश लोगों के लिए आशा की किरण है, गलत काम करने वाले लोगों के लिए भय का कारण है तथा कानून का पालन करने वाले लोगों को राहत देती है। यह आम समाज के लिए एक ऐसी शरण स्थली है, जहां गरीब और अमीर दोनों को ही आसानी से न्याय मिलता है और न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठने वाले लोगों के लिए यह एक सम्मान और गौरव का स्थान हुआ करती हैपरन्तु बदलती परीस्थितियों देखा जाये तो आज बुरे लोग इसकी परवाह ही नहीं करते, चालाक लोगों ने तो इसे मजाक बना रखा है और जब कानून का पालन करने वाले लोग ही इससे डरे-से लगते हैं तो फिर न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगेगा। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया ये लोकतन्त्र के चार स्तम्भ हैं और इन्हें मजबूत बनाए रखना हम सबका दायित्व है।


    मीडिया, कार्यपालिका, विधायिका को एक पल के लिए यदि नजरंदाज कर भी दिया जाये क्योंकि कार्यपालिका पूरी तरह विधायिका की कृपापात्र बनी रही है, मीडिया इनकी सेवा में लगी है। जिसमें वही जा सकता है, जिसके पास शिक्षित होने के लिए धन और पहुंच हो। लेकिन न्यायपालिका अगर कमजोर हो गयी तो इसका असर समस्त समाज और राष्ट्र पर पड़ेगा। कारण जब देश के नीति निर्धारक ही न्यायालय के बहत से निर्णयों का पालन नहीं करेंगे, जब सरकारें खुद ही सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान नहीं करेंगी तो एक आदमी उसका सम्मान करने के लिए कैसे प्रेरित हो सकता है? लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहा है। भारतीय संविधान का इतिहास बिल्कुल अलग किस्म के दो तथ्य हमारे सामने रखता है, एक तथ्य है १६५०-७० का, जब संसद अलग-अलग हितधारकों की युद्धभूमि बनी हुई थी और दूसरा तथ्य है १६७३ में न्यायपालिका, संविधान में मनमर्जी से संशोधन करने की उस वक्त की प्रधानमंत्री की इच्छाओं के आगे दीवार की तरह खड़ी हो गई थी। इससे चिढ़ कर तत्कालीन सरकार ने एक प्रतिबद्ध न्यायपालिका का विचार सामने रखा। कहा जाता है कि उस दौर में प्रख्यात जजों के साथ कठोरता का पालन किया गया था। तब से लेकर अब तक न्यायपालिका को सरकारों द्वारा अपना आज्ञाकारी बनाने की कोशिश होती रही है। हालांकि २४ अप्रैल, १६७३ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य' के मामले में दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले के चलते देशवासियों का न्यायालय के प्रति निष्ठा एवं सम्मान जागा और न्यायालय सभी के लिए आशा की अंतिम किरण बन गया। परन्तु इसके कुछ ही समय पश्चात शहबानो के मामले में तत्कालीन राजनेताओं द्वारा फिर से न्यायालय को कमजोर करने का प्रयास किया गया।


    पिछले दिनों आसाराम और रामरहीम के मामले में भी न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा बढ़ा। लोगों को लगा कि भारत की न्यायव्यवस्था अब ताकतवर हो गई। किन्तु अब लगता है जैसे घटनाओं को भी समय के तराजू पर तौलकर देखा जाता है कि कब, कैसे, और किस के लिए इंसाफ मांगना है, किसकी सजा तय करनी है इसका भी निर्णय मौका देखकर ही करना है। यह बेहद अफसोसजनक है कि आजकल हर मामले, मसले, एवं समस्या को सियासी और मीडियायी चश्मे से देखा जाता है। न्यायिक चश्मा गायब होगा तो नतीजतन कुछ ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें न्यायपालिका केस के तथ्यों की बजाय जनभावना के बारे में अधिक चिंतित नजर आती है। मीडिया और राजनीति अप्रत्यक्ष रूप से न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता है। जो बात न्याय के अनुसार तथ्यात्मक रूप से सही होती है, उसे राजनीतिक रूप से प्रस्तुत किया जाता रहा है। राजनीति, न्यायपालिका, मीडिया और आम लोगों के बीच की यह स्थिति बहुत जटिल है, इतनी जटिल स्थिति में इस समस्या का समाधान निकालना बहुत जरूरी है। क्योंकि इसके लिए बहुत से स्तरों पर सुधार की आवश्यकता होगी, पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके लिए एक बहुत ही सजग समाज की आवश्यकता होगी। साथ ही न्याय व्यवस्था और हमारा न्यायालय एक सम्मानीय स्थल होने चाहिए, ताकि ईमानदार लोग उसे एक पवित्र स्थान की तरह सम्मान दे सकें, जहां वे कानून से असुरक्षित अनुभव करने की बजाय सुरक्षित अनुभव कर सकें।


    महर्षि दयानन्द अपने अमरग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास में लिखते हैं -


    “और जो पवित्रात्मा सत्याचार और सत्पुरुषों का संगी यथावत नीतिशास्त्र के अनुकूल चलनेहारा श्रेष्ठ पुरुषों के सहाय से युक्त बुद्धिमान है वही न्यायरूपी दण्ड के चलाने में समर्थ होता है। इसलिए सब सेना और सेनापतियों के उपर वर्तमान सर्वाधीष राज्याधिकार इन चारों अधिकारों में सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों में प्रवीण पूर्ण विद्यावाले धर्मात्मा जितेन्द्रिय सुशील जनों को स्थापित करना चाहिए अर्थात् मुख्य सेनापति, मुख्य राज्याधिकारी, मुख्य न्यायाधीश, प्रधान और राजा ये चार सब विद्याओं में पूर्ण विद्वान् होने चाहिए।"


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