अवतारवाद का सच

संसार  में प्रायः अवतारवाद को लेकर यह अवधारणा बनी हुई है कि भगवान या ईश्वर अवतार यानी कि जन्म लेता है। यहाँ विचार करने वाली बात यह है कि, यदि कहा जाये कि मनुष्य अवतार लेता है, तो यह सम्भव है, क्योकि अवतार तो केवल वही ले सकता है जो एकदेशी अणु हो, जैसे कि आत्मा, यानी कि मनुष्य, तो यह अवतार ले सकता है।


 


लेकिन परमात्मा के लिए यह कहा जाये तो यह केवल मुर्खता है क्योकि ईश्वर तो सर्वव्यापक है, अतः उसको तो अवतार अर्थात् शरीरधारण करने का प्रश्न ही नहीं उठता। ईश्वर को अवतार के रुप में मान लेना सर्वथा अज्ञानता है। जो स्वयं इस संसार को बनाता है, सँवारता है और संहार करता है, उस सर्वत्र विद्यमान को अवतरण की क्या आवश्यकता है?


 


वेद कहता है –


 


ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।


 


अर्थात् - इस संसार में जो भी यह जगत् है, सब ईश्वर से आच्छादित - आवृत है, अर्थात् ईश्वर सृष्टि के कण-कण में बसा है, सर्वव्यापक है। यह सब धनादि जिसका हम उपयोग कर रहे हैं, सब उसका ही है। हम यह सोच कर प्रयोग करें कि यह हमारा नहीं है। जो कुछ हमें उस प्रभु ने दिया है, उस सबका त्याग के भाव से प्रयोग करें।


 


ईश्वर निराकार है―निर्विकार है―सर्वज्ञ है, फिर उसको माँ के पेट में 9 महिने 10 दिन रहने की क्या आवश्यकता है? निराकार होकर साकार होना असंभव है। भला वह परमात्मा विकारी क्यों कर बन सकता है? सर्वज्ञ होकर वह अल्पज्ञ क्यों बनना चाहेगा? ईश्वर तो सर्वव्यापक है, ऐसा कौन-सा स्थान है जहाँ वह पहले से विद्यमान नहीं? वह सदा से एकरस है, शुद्ध-पवित्र है―वह सबका माता-पिता-बंधु-सखा है, फिर उसे किसी का बेटा बनने की क्या पड़ी है?



श्रीकृष्ण भगवान योगेश्वर थे, उनको अच्छे-बुरे का भली भाँति ज्ञान था। महान् आत्मा होने के कारण उनकी प्रबल इच्छा थी कि जब-जब धरती पर अन्याय के कारण अधर्म फैलता है उस समय अगर मैं जन्म लेकर लोगों को अधर्म से बचाऊँ और धर्म की फिर से स्थापना करूँ, तो इस कथन में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? महात्मा लोगों की भावना यही होती है कि जब-जब जन्म लेवें भटके हुओं को सही मार्ग दिखाएँ तथा उनको लक्ष्य तक पहुँचाने में ही उनका मार्ग प्रशस्त करें।


 


श्री कृष्ण योगी थे-महात्मा थे। अगर उनकी यह इच्छा रही होगी तो क्या बुराई है? उनके कथन को हम लोगों ने गलत समझा है कि जब चाहें जन्म ले सकते हैं। मुक्तात्माएँ भी यही चाहती हैं कि वे संसार में जाकर सबका मार्गदर्शन करें।


 


ईश्वर की व्यवस्था के बिना कोई भी आत्मा स्वेच्छा से शरीर धारण नहीं कर सकता और न ही शरीर का निर्माण कर सकता है।



जरा सोचिये और विचारिये कि ईश्वर जन्म क्यों लेना चाहेगा या अवतार लेना क्यों चाहेगा?  दुष्ट लोगों का सफाया करने के लिए? परमपिता परमात्मा कभी बिना कारण के किसी को कष्ट नहीं देता। मनुष्य मरता है अपने ही कारणों से। प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध आचरण से शरीर में परिवर्तन आता है―शरीर रोगी बन जाता है और अंतिम परिणाम मृत्यु होती है। मृत्यु के अनेक कारण होते हैं।



ईश्वर सबको सुधरने का अवसर देता है। मनुष्य बुरा हो या अच्छा―सबको जीने का अधिकार मिलता है। किसी विशेष व्यक्ति का नाश करने के लिए ईश्वर अवतार ले, यह तो ईश्वर का निरादर करना है।


 


मनुष्य का अवतरण या जन्म-मरण संभव है–महापुरुषों का अवतरण या जन्म संभव है, परन्तु ईश्वर को ऐसे बंधनों में बाँधना केवल नासमझी की ही बात है। ये स्वार्थी लोगों की पोपलीलाएँ हैं, और कुछ भी नहीं।


 


ईश्वर का साकार अर्थात् शरीरधारण करना सर्वथा असम्भव है। परमात्मा निराकार है, उसको ज्ञान द्वारा अनुभव किया जा सकता है। योगसाधना से ईश्वर की प्राप्ति होती है।


 


न कभी ईश्वर का अवतार हुआ है और न कभी होगा―यही सत्य है, यही वैदिक मान्यता है। ईश्वर निराकार है और निराकार ही रहेगा।


 


संसार में तीन तत्त्व अनादि और अनन्त है, जिसका कोई अंत नही है वो है - ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति ।


 


ऋग्वेद में बताया गया है कि – 


 


द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।


तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नवन्यो अभिचाक शीतिः।। – ऋग्वेद 1/164/20


 


 


अर्थात - यहाँ यही बताया है कि एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं, उन में से एक उस वृक्ष के खट्टे-मीठे फलों का स्वाद चख रहा है, तो दूसरा पक्षी उस को देख रहा है, स्वाद नहीं चख रहा। आलंकारिक भाषा में यहाँ त्रिविध अनादि तत्त्व ईश्वर, जीव व प्रकृति का वर्णन है। वृक्ष प्रकृति के रूप में दर्शाया है, देखने वाले पक्षी का संकेत ईश्वर के लिए तथा फल खाने वाला पक्षी का जीव की ओर संकेत है। ईश्वर इस प्रकृति में जीव के कर्मों को देख रहा है। वह कर्मों का भोक्ता नहीं है। जब भोक्ता नहीं तो जन्म किसलिए? वह तो सर्वव्यापक विभु है, सर्व शक्तिमान् है, अपनी शक्ति से सृष्टि को चला रहा है। रावण हो या दुर्योधन, सबने अपने कर्मों को भोगा।


 


ईश्वर के अवतार से राम का कोई सम्बन्ध नहीं। वे कौशल्या के गर्भ से पैदा हुए, संसार में आए और उन्होंने अपने कर्म किए। उनका कर्म उनके साथ था। वे दशरथ के पुत्र थे। ईश्वर किसी का पुत्र नहीं, अपितु सबका पिता है। कर्मफल भोक्ता तो गर्भ में भी रहेगा, जन्म भी लेगा, दुःख भी सहेगा, क्लेश भी सहेगा, मोह-माया के बन्धन में भी रहेगा मृत्यु भी होगी। यह गुण कर्मफल भोक्ता जीव के तो हैं, ईश्वर के नहीं, अतः राम को ईश्वर बताना न तर्कसंगत है, न युक्ति युक्त। राम दशरथ नन्दन थे, राजा मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वेदानुसार चलने वाले थे।


 


उनका जीवन हमारे लिए प्रेरणा प्रदान करता है।


 


लेखक – आचार्य अनूपदेव


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