अन्य मतों पर महर्षि दयानन्द का प्रभाव


अन्य मतों पर महर्षि दयानन्द का प्रभाव




           सनातन धर्म स्त्रियों और शूद्रों को वेद पढ़ाने के विरुद्ध था। स्वामी दयानन्द ऐसे प्रथम सुधारक हुए हैं, जिन्होंने वेद के प्रमाण और युक्तियों से इस विचार की कड़ी समालोचना की। इस समालोचना का यह प्रभाव हुआ है कि सैंकड़ों स्त्रियाँ तथा शूद्र संस्कृत की शास्त्री, आचार्य, तीर्थ तथा एम.ए. परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुके हैं। इन में प्रायः सब को वेद का कुछ अंश अवश्य पढ़ाया जाता है और बिना किसी विरोध के सनातन धर्म के बड़े-बड़े विद्वान् विद्यालयों में इन्हें पढ़ा रहे हैं। सन्त विनोबा भावे ने एक बार अपनी मध्यप्रदेश की यात्रा में यह घोषणा की थी कि मैं ऐसे अछूतों को तैयार कर रहा हूँ जो कि वेद के विद्वान् बनें। उसके लिए बिना किसी संकोच के सब हिन्दू उस विचार की पूर्ति के लिए उन्हें द्रव्य का सहयोग देने को तैयार हो गए थे।


           मैंने वे दिन भी देखे हैं कि जब आर्यसमाज ने कन्या-पाठशालाएँ आरमभ की तो लोगों ने स्त्री-शिक्षा के विरुद्ध व्याखयान दिए और पाठशालाओं के आगे धरना दिया। इस समय परिवर्तन यह हुआ कि स्वयं सनातन धर्म सभाओं ने कन्या-पाठशालाएँ खोली हुई हैं। आर्य-पाठशालाओं में सब लड़कियों को सन्ध्या-मन्त्र सिखाये जाते हैं और अधिकतर लड़कियाँ सनातन धर्मावलबियों की हैं, जो सहर्ष इन मन्त्रों को पुत्रियों से घर में सुनते हैं। यह बड़ा भारी परिवर्तन है।


          नमस्ते-आरमभ में स्वामी दयानन्द ने सबको परस्पर नमस्ते करने का विचार दिया तो इसका व्याखयानों और लेखों द्वारा भारी विरोध किया गया। मैंने वे दिन देखे हैं, जब आर्यसमाज और सनातन धर्म में नमस्ते पर शास्त्रार्थ होता था। वर्तमान समय में नमस्ते का प्रचार इतना हुआ कि रूस के तत्कालीन प्रधानमन्त्री क्रुश्चे जब भ्रमण में दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों नर-नारियों के सामने भाषण देने  हुए तो उन्होंने सबसे पहले हाथ जोड़ कर नमस्ते की। सिनेमा की फिल्मों में भी सब पात्र आदर दिखाने के लिये नमस्ते का प्रयोग करते हैं। प्रत्येक हिन्दू ने नमस्ते अपना लिया है।


         वर्ण व्यवस्था-आचार्य दयानन्द ने ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों को जन्म से न मानकर गुण कर्म-स्वभाव से माना है। इसका बड़ा विरोध किया गया। वर्तमान काल में सनातन धर्म का शिक्षित वर्ग भी जाति-पाँति का भेद हटाकर लड़के-लड़कियों के विवाह कर रहा है। ऐसे अनेक उदाहरण हम प्रतिदिन देखते हैं, जब ब्राह्मण लड़कियों का अब्राह्मण लड़कों से विवाह हो रहा है। अखबारों में जहाँ विवाह के विज्ञापन छपते हैं, प्रायः यह लिखा होता है कि विवाह में जाति-बन्धन नहीं। दिल्ली में इतिहास के विशेषज्ञ डॉ. ताराचन्द एम.पी. ने पटेल-स्मृति व्यायानमाला के प्रथम व्यायान में कहा था कि प्राचीन आर्यों में जन्म से जाति नहीं मानी जाती थी, प्रत्युत गुण-कर्म से मानी जाती थी। यह आचार्य दयानन्द की समीक्षा का ही प्रभाव है।


         ज्वर कैसे होता है?-पहले प्रत्येक वैद्य यह मानता था कि रुद्र (महादेव) के क्रोध से ज्वर पैदा हुआ (रुद्र कोपाग्निसभूतः), परन्तु वर्तमान युग में इस बात को उपहासजनक अनुभव करते हुए अब यह अर्थ करते हैं कि वेद और ब्राह्मण-ग्रन्थों में रुद्र नाम अग्नि का आता है। रुद्र-कोप का यहाँ अर्थ यह है कि अग्नि अर्थात् पेट की जठराग्नि के कोप अर्थात् विकार से ज्वर उत्पन्न होता है।


         सूर्यदेव-कोणार्क (उड़ीसा) में सूर्यदेव का एक बहुत ही विशाल और सुन्दर मन्दिर है। उसमें सूर्यदेव की एक मूर्ति पत्थर के रथ पर बनी हुई है। रथ के सात घोड़े और 12 पहिए हैं। उस समय में यह कहा गया है कि इस रथ के सात घोड़े सूर्य-किरणों के सात रंग और 12 पहिए वर्ष के 12 मास को प्रकट करते हैं।


        यह आचार्य दयानन्द के प्रभाव का परिणाम है कि इस प्रकार की अनेक गाथाओं को, जो पहले सनातनधर्मी विद्वान् ऐतिहासिक मानते थे, अब आलंकारिक मानकर अर्थ करते हैं।


         ईसाई धर्म-ईसाई धर्म की समीक्षा दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के 13 वें समुल्लास में की है। उस समीक्षा का प्रभाव ईसाई धर्म पर पर्याप्त हुआ है। सन् 1919 में भारत में पादरियों की एक कमीशन बैठी। उसने 1500 पादरियों को चार प्रश्न भेजकर उसके उत्तर माँगे-(1) क्या ईसामसीह कुमारी मरियम के गर्भ से बिना पिता के उत्पन्न हुआ था? इसके उत्तर में 95 प्रतिशत पादरियों ने उत्तर भेजा कि वह कुमारी मरियम से उत्पन्न नहीं हुआ, प्रत्युत किसी पिता से उत्पन्न हुआ था। (2) क्या ईसामरने के बाद कब्र से उठा? इसका उत्तर 75 प्रतिशत पादरियों ने दिया कि नहीं उठा। (3) स्वर्ग और नर्क हैं तो कहाँ हैं? इसका उत्तर 83 प्रतिशत पादरियों ने दिया कि स्वर्ग और नर्क कोई स्थान विशेष नहीं हैं। (4) क्या मृत्यु के पीछे जीवात्मा रहता है? 96 प्रतिशत पादरियों ने उत्तर दिया कि जीवात्मा अमर है और रहता है।


         डॉ. जे.डी.संडरलैंड ने एक पुस्तक लिखी है origin and character of bible (दि ऑरिजिन एण्ड कैरेक्टर ऑफ दि बाईबल)। उसमें उसने स्वामी दयानन्द से भी बढ़कर बाइबिल की समालोचना की है। इसी पुस्तक के पृष्ठ 132-33 पर लिखा है कि सब विद्वानों का बिना संशय का यह निर्णय है कि बाइबिल की रचना मनुष्य-कृत होने के कारण इसमें भूलें भी हैं। पादरी संडरलैंड ने इन भूलों के बहुत से प्रमाण दिए हैं। हम केवल उनमें से तीन दृष्टान्त देते हैं। (1) नई व्यवस्था के 11 पर्व में भक्ष्याभक्ष्य पशुओं की गिनती की हुई है। उसमें शश (खरगोश) को जुगाली करने वाला पशु लिखा है जो कि सर्वथा ठीक नहीं है। (2) बाइबिल का सृष्टि-उत्पत्ति और जल-प्रलय का वर्णन विज्ञान के विरुद्ध है। (3) यहोशु के कहने पर सूर्य खड़ा हो गया और अपनी गति छोड़ दी। यह बात भी विज्ञान और बुद्धि के विरुद्ध है।


          इस्लाम-सत्यार्थप्रकाश के 14 वें समुल्लास में स्वामी दयानन्द ने इस्लाम धर्म की समालोचना की है। स्वामी जी के पीछे अमर शहीद पं. लेखराम जी और स्वामी दर्शनानन्द जी आदि आर्य-विद्वानों ने भी इस्लाम धर्म की पर्याप्त समालोचना की। स्वामी जी महाराज की समीक्षा के पीछे सर सय्यद अहमद खा ने उर्दू भाषा में कुरान शरीफ का भाष्य किया। अहमदी समप्रदाय की लाहौरी शाखा के प्रधान मौलवी मुहमद अली एम.ए. ने कुरान का अंग्रेजी और उर्दू में अनुवाद किया। इन अनुवादों में जो-जो कटाक्ष आर्य-विद्वानों के होते थे, उनसे बचने के लिए उन्होंने पुराने सब भाष्यों को छोड़कर बहिश्त (स्वर्ग) दोजख (नर्क), फरिश्ते, जिन, शैतान आदि की व्याखया बुद्धिपूर्वक की और मुसलमानों के पहले विचारों को बदलने का यत्न किया। इन दोनों अनुवादों से मुस्लिम जनता ने सर सय्यद अहमद को नेचरिया और दहरिया (नास्तिक) की उपाधि दी और अहमदियों को नास्तिक और इस्लाम का शत्रु माना।


         इन दोनों मुसलमान अनुवादकों ने नर्क और स्वर्ग को स्थान-विशेष न मानकर मनुष्य की दो प्रकार की अवस्थाएँ माना है। (this shows clearly that paradise & hell are more like two conditions than two places )(मुहमद अली के अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका पृष्ठ 63)।


       मुहमद अली ने फरिश्ते और शैतान की पृथक् सत्ता न मानकर मनुष्य की अच्छी और बुरी भावनाओं को माना है। उन्होंने बुराई के प्रेरक शैतान को सारथि और भलाई के प्रेरक फरिश्ते को साक्षी कहा है। (देखो भूमिका पृष्ठ 78) नया मुहमद नूरुद्दीन कारी काशमीरी अपनी इस्लामी अकायद पृष्ठ 74 पर लिखते हैं- ''मरते वक्त अजाब या सवाब के फरिश्ते आते हैं, वे दरहकीकत मरने वाले के बद व नेक अमाल होते हैं।'' मुसलमानों का मत है कि कयामत के दिन मनुष्य को उसके कर्मों की पुस्तक दी जावेगी। मौलवी मुहमद अली भूमिका के पृष्ठ 61 में इस पुस्तक को न मानकर लिखते हैं कि ये कर्म मनुष्य के भीतर हैं और उस दिन कर्मों के प्रभाव से फल दिया जायेगा।


       इस प्रकार स्वामी दयानन्द जी के प्रचार से सब धर्म वालों ने अपने सिद्धान्तों और अर्थों को अपने धर्म की बुद्धि और विज्ञान के आधार पर सिद्ध करने का यत्न किया है। यह आचार्य दयानन्द की समीक्षा का ही परिणाम है।


 



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