आत्मा बलशाली हो


*वेदवाणी*
न किष्ट्वद्रथीतरो हरी यदिन्द्र यच्छसे।
 न किष्ट्वानु मज्मना न किः स्वश्व आनशे।। ऋग्वेद १-८४-६।।
*भावार्थ*
हे आत्मा (इंद्र), तुम से उत्तम कोई सारथी नहीं हो सकता इस शरीर रूपी रथ को चलाने के लिए। तुम घोड़े रूप इंद्रियों के स्वामी हो। तुम एक जैसे हो, कोई परिवर्तन नहीं। शक्ति, दक्षता और महिमा में तुम्हारे जैसा कोई नहीं।।
*काव्य भाव*
हे आत्मा तुम हो बलशाली,
अपनी शक्ति को पहिचानो।
तन रूपी रथ मिला ये तुमको,
सारथी इंद्र हो निज
सम्मानो।
घोड़े रूपी दशों इन्द्रियाँ,
मन बुद्धि लगाम कसने।
शुभ कर्मों के लिए मिले सब,
हो विमल आनंद को भी भरने।
अपरिणामी चेतन सत्ता,
शक्ति, दक्षता भारी है।
इसी जन्म में पहिचानो ,
ईश्वर सौगात (कृपा प्रसाद) न्यारी है।।
-आचार्या विमलेश बंसल आर्या
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