आर्य समाज का नौवां नियम

आर्य समाज का नौवां नियम


             आज आर्य समाज के नौवें नियम पर विचार करेंगे। आर्य समाज का नौवां नियम यह है - 
 "प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में संतुष्ट में रहना चाहिए, किन्तु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।" 
             इस नियम में अपनी उन्नति करने के साथ-साथ दूसरों की उन्नति के लिए प्रयास व प्रयत्न करने की बात कही है। अपनी उन्नति मात्र से संतुष्ट नहीं रह जाना है। अपनी उन्नति तभी सार्थक होगी जब हम अपने उन्नत सामर्थ्य का दूसरों की उन्नति में प्रयोग करते हैं। तभी  हमारी उन्नति सफल व सार्थक है। इसलिए हम में से प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि हम अपनी उन्नति के साथ-साथ दूसरों की उन्नति के लिए अपने सब सामर्थ्य से सदैव प्रयत्नशील रहें।
 ईश्वर भी हमें इसी प्रकार की आज्ञा देता है।
"उद्यानं ते पुरुष नावयानं" 
(अथर्व० ८/१/६)
        अर्थात् -  हे मनुष्य! तू अपने परिश्रम और पुरुषार्थ से उन्नति को प्राप्त कर।
ईश्वर आज्ञा देता है कि अपने जीवन में जो हमें उन्नति प्राप्त करनी हैं वह किसी के साथ छल करके नहीं, धोखा देकर के नहीं, बल्कि अपने परिश्रम और पुरुषार्थ से उन्नति करनी है।
 परमपिता परमात्मा अपनी कल्याणमयी वेद वाणी के द्वारा बार-बार हमारा मार्गदर्शन करता है।
"कृतं मे  दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहित:।"
(अथर्व० ७/५०/८)
              अर्थात् - परिश्रमी और पुरुषार्थी व्यक्ति ही जीवन मे सफलता प्राप्त करता है।
             हिंदी के एक सुप्रसिद्ध कवि 'श्री रामधारी सिंह दिनकर जी, ने बड़ा  सुन्दर संदेश इसी विषय पर दिया है।


 चलो अभीष्ट मार्ग पर सहर्ष खेलते हुए,
 विपत्ति विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते हुए।
 घटे ना हेल-मेल हां बढे ना भिन्न्ता कभी,
 अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हो सभी।।


           अतः सभी को अपने जीवन में अपने परिश्रम और पुरुषार्थ के द्वारा उन्नति को प्राप्त करते हुए, दूसरों की उन्नति के लिए भी प्रत्न शील रहना चाहिए। यही हम सब का कर्तव्य है। यही ईश्वर की आज्ञा है। यही सुख का मूल है। यही मनुष्य धर्म भी है यही ऋषि यों का मंतव्य भी है। यही हमारे  श्रेष्ठ पूर्वजों का मार्ग भी है।


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