आईये इस विश्व के नागरिक कहलायें

आईये इस विश्व के नागरिक कहलायें


    आज विज्ञान ने इतने बड़े संसार को एक एक गांव का रूप दे दिया हैं। इंटरनैट, टैलीफोनने हमें एक दूसरे के उतना ही नजदीक ला दिया है जितना कि पुराने समय में एक गांव में रहने वाले व्यक्ति महसूस करते थेपर इस सब के बाबजूद कभी मानव इतना अकेला महसूस नहीं करता था जितना कि अब करता है। इसका कारण यह है कि वह अपने में ही इतना व्यसत है कि उसे दूसरे के बारे में जानने का समय ही नहीं हैं और न ही वह जानने की आवश्यकता महसूस करता हैआप अपने ही शहर में अगर किसी से दो घर दोड़कर रह रहे परिवार के बारे में पूछोंगे तो जयादा स्म्भावना यही है है कि आपको सूनने में मिले-------हां एक परिवार रहता तो है पर हमें उनें बारे में अधिक जानकारी नहीं। यही नहीं किसी बृद्ध व्यक्ति को मिलिये जो कि अच्छे पद से सेवा निवृत हुआ है, अच्छी पैंशन लेता है, उसकी कोई ऐसी जिम्मेवारी भी नहीं जिसके लिये वह चिन्तित हो फिर भी उसके चेहरे पर खुशी या सन्तोष के स्थान पर निराशा नजर आयेगी मानों उसके साथ कोई धोखा या छलकपट हुआ है। वह अपने आपको सब के होते हुये भी बहुत अकेला पाता हैहमारे शास्त्रों में कहा है कि मनुष्य की योनी बहुत अच्छे कर्मो की ही फल होता है। यानी कि यह मानव शरीर बहुत मुश्किल से मिलता हैएक व्यक्ति ने बहुत ठीक कहा----हमने अपने विवेके और मूल्यों को गिरवी रखकर भौतिक उन्नति प्राप्त की है, आत्मा का हनन कर हम ताकत को एकत्रित रहें हैं। श्शान्ति पर्व के स्थान पर, युद्धों को याद कर पर्व मनाते है, हमने कितनों को जीवन दिया उसके स्थान पर यह याद रखते हैं कितनों को मारा


    ऐसी मानसिकता तभी ठीक हो सकता है जब कि हम अपने को दूसरों से अलग न मानकर दूसरों में ही एक मान कर चलेंआप यह इन्तजार न करें कि कोइ आपका हाल पूछने आये । आप पहल कर दूसरों का हाल पूछे । रोज मिलते हैं और यह भी जानते हैं कि यह ब्यकित मेरे घर के नजदीक ही रहता है पर जैसे ही एक दूसरे के पास पहुचते हैं तो अपना मुंह फेर लेते हैंऔर कुछ नजारा यह भी होता है कि दो अनजाने व्यक्ति मिले एक दूसरे को देख कर मुस्करा दिये, एक दूसरे के बारे में पूछा और मित्र बन गये मैं इतना ही बता सकता हूं, अपने जानकारों से ही मुंह फेरने वालों से कही अधिक दूसरों के साथ जीवन जीने वालों में कहीं अधिक जीने की उमंग, उत्साह और ,खुशी नजर आयेगी । वेद में मित्रास्य चक्षुषा समीक्षामहे । यजु. 36/18 कहकर हम सभी को परस्पर एक दूसरे को मित्रा की दृष्टि से देखने का आदेश दिया और मित्रता का भाव रखने के लिए परस्पर प्रेम अनिवार्य शर्त है । मन, वचन, कर्म से सर्वदा सर्वथा किसी भी प्राणी के प्रति वैर की भावना न रखना और उसके हित का सोचना ही प्रेम और मित्रता है।इसे जीवन मे लाने का सरल उपाय है कि हम जीवन में जैसे व्यवहार की अपेक्षा दूसरों से अपने लिए करते हैं वैसा व्यवहार स्वयं दूसरों से किया करें । यदि ऐसा कर पायेंगे तो निश्चित रूप से सबसे प्रेम बढ़ेगा और मित्रता बढ़ेगी प्रेम की भावना का प्रारम्भ घर से करें माता-पिता, भाई-बहन, बन्धु-बान्धव सभी रिश्तों को प्रेम भाव से सिंचित कर मजबूत बनायें फिर इस इकाई को दृढ़ करते हुए पड़ौसी समाज देश और राष्ट्र से प्रेम करें और इसकी परिधि को बढ़ाते हुए संसार के प्राणिमात्रा से प्रेम करें और इस प्रेम की पराकाष्ठा इस संसार के रचयिता नियामक ईश्वर से सम्पूर्ण समर्पण भाव से प्रेम करें हमारे शास्त्र सारे विश्व को एक परिवार समझ कर सब के सुख की कामना काने की बात करते है |


    अथर्व वेद में कहा है-


    1.सहृदय सामनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः अन्योः अन्यमसि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ।। अथर्व 3.30.01


                   तुम्हारे हृदय में सामनस्व हो, मन द्वेष रहित हो, एकीभाव हो. परस्पर स्नेह करो जैसे गौ अपने नवजात बछड़े से करती है.


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