हिरण्यमयेनप पात्रेण सत्यस्यापितमं मुख्यम तत्व पूषन्नपावृणु सत्यथमार्य दृष्टये

हिरण्यमयेनप पात्रेण सत्यस्यापितमं मुख्यम तत्व पूषन्नपावृणु सत्यथमार्य दृष्टये


    उस परम स्त्य ब्रहम के दर्शन तभी होंगे जब कि व्यक्ति की आंखों के आगे से धन दौलत का संसारिक सुवर्णमय आवरण हट जायेगाहम माया के इस आवरण को हटा नहीं पाते इसलिये परम सत्य ब्रहम के दर्शन नहीं कर पाते हैं जो कि मानव जीवन का लक्ष्य है।


    कहते हैं कि एक बार संत रविदास जी की कुटिया में एक साधु आये। संत रविदास स्वभाव से ही बहुत सेवाभाव वाले थे। हुदय में उनें ईश्वर का बास था और कर्मेदियां सेवा भाव में ही रहती थीसाधु संत रविदास की सेवा से बहुत प्रसनन था । विदा लेने से पहले साधु ने संत जी को पारसमणी भेंट की तो संत रविदास ने विनम्रता से लेने से ईकार कर दियाउनका कहना था कि उन्हु तो सब से बड़ा ईश धन मिला हुआ है, वे इस मणी को लेकर क्या करेंगे। ज बवह नहीं माने तो साधु उस पारसमणि को जहां उनका सामान पड़ा रहता था वहीं रख कर चला गयाकुछ दिनों बाद वही साधु संत रविदास के पास फिर से आयासंत जी उसी तरह अपने जूते ठीक करने के काम में लगे हुये थेसाधु हैरान था, उसने संत जी से पूछा------जो मैं पारसमणी छोड़ गया था, क्या उसका प्रयोग नहीं किया? सुत जी हंस दिये और बोले -----मैने आपको पहले भी कहा था कि पारसमणी मेरे किसी काम की नहीं, आप किसी लरूरतमन्द को दे देंसाधु हैरान था कि उसने जहां वह मणी रखी थी वहीं पड़ी हुई थी। संत रविदास ने उसे छुआ तक नहीं था। उसी लिये कहा है ------ उस को ही परम सत्य ब्रहम के दर्शन तभी होंगे जिस व्यक्ति की आंखों के आगे से धन दौलत का संसारिक सुवर्णमय आवरण हट गया है


    इसी तरह महर्षि दयान्नद सरस्वती के जीवन में बहुत से अवसर आये जब कि उन्हे धन वाले व्यक्तियों ने पैसे से महनत के ओहदे से मालोमाल करने की बात की परन्तु महर्षि दयान्नद सरस्वती ने वह वब ठुकराकर उनहें हैरान कर दिया, कारण जिसे ईश धन मिला हो उसे इस संसारिक धन की आवश्यकता नहीं रहती। और जब तक मन इस सांरिक धन को पाने की होड़ में लगा है तो ईश धन नहीं मिलता


    भगवान के ऐश्वर्य की चोटी किन्हें प्राप्त होती है, उनका ऐश्वर्य पूर्णरूप से किन्हें प्राप्त होता है? उनको जो भगवान से कह सकते हैं कि 'ते वयम्'– हम आपके हैं। जिनकी चित्तवृत्ति सदा भगवान में लगी रहती है, जो सदा भगवान को स्मरण रखते हैं, भगवान का रूप जिनके मन की आँखों के आगे सदा रहता है, इसलिए हम जो भगवान के गुणों से आकृष्ट होकर उन्हें अपने चरित्र में धारण करते रहते हैं और इस प्रकार जो भगवान के अपने बन जाते हैं उन्हें भगवान का ऐश्वर्य पूर्णरूप से प्राप्त होता है हमें जो बहुत बार दु:ख में दब जाना पड़ता है, हमसे जो सुख-आनन्द बहुत बार दूर भाग गया-सा दीख पड़ता है, उसका कारण यह होता है कि हम प्रभु के नहीं रहते, हम प्रभु से दूर चले जाते हैं, हमारा चरित्र प्रभु के गुणों से विरहित होकर पापमय बन जाता हैजब तक हम प्रभु के रहते हैं, प्रभु के सत्य, न्याय, दया, ज्ञान, बल आदि गुणों का समावेश तब तक हममें रहता है तब तक हमें प्रभु का ऐश्वर्य निरन्तर प्राप्त होता रहता हैज्यों-ज्यों हम प्रभु से परे हटते जाते हैं, त्यों-त्यों हमसे ऐश्वर्य छिनने लगता है और हमारा दुःख–संकट बड़ जाता है


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