आत्म चिन्तन


आत्म चिन्तन




कभी एकान्त में बैठकर विचार करने के लिए समय निकाला कि अब तक मैंने क्या किया, क्या कर रहा हूँ और आगे क्या करने का विचार है, मेरा लक्ष्य क्या है? इससे मुझे, परिवार, समाज या राष्ट्र को लाभ मिला है या मिलेगा या हानि हुई है या होगी? इस तरह से चिन्तन या विचार करते हुए चलने से, हम अनेक प्रकार के न करने योग्य कार्यों को करने से बच जाते हैं और करने योग्य कार्यों को अच्छी तरह, भली प्रकार से करने के लिए उद्यत हो सकते हैं, क्योंकि ऋषि ग्रन्थ मानव को निर्देश देते हैं कि सदा अपना आत्म निरीक्षण करते रहना चाहिए, जिससे हम अपने लक्ष्य को सदा सामने राते हुए, उसके लिए साधनों को एकत्र करते रहें और बाधकों को जान कर दूर करते रहें।


सामान्य रूप से यदि मेरे पास लोक में जीवन यापन के लिए पर्याप्त सुख साधन हैं, मेरी स्थिति ठीक है तो मेरा प्रयास रहेगा कि मुझे कोई दुःख न आए, सुख मिलता रहे और प्रकृति इसी तरह से चलती रहे, जो सभव नहीं। क्योंकि जीवन की दो अवस्थाएँ हैं- एक गति और दूसरी स्थिति। सिद्धान्त के अनुसार यदि चले रहे हैं तो कहीं-न-कहीं पहुँचगे, यदि गति रुक जाती है तो रुक जाएँगे, जिन्हें हम चाहते नहीं। संसार में आज तक न कोई दुःख रहित सुख प्राप्त कर सका है, न कर रहा है और न भविष्य में कर सकता है। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार-


परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वंविवेकिनः।


अर्थात् परिणाम दुःख, ताप दुःख,, संस्कार दुःखों और सत्व, रज, तम गुणों के परस्पर विरोधी स्वभाव से योगी (विवेकी) पुरुष के लिए, सब कुछ दुःख ही है।


हम लौकिक मानव दुःख मिश्रित सुख का भोग करते हैं, इसमें से मिले दुःख को भूल जाते हैं। सुख को याद करके उसे प्राप्त करने के प्रयत्न करते रहते हैं। हमारा शरीर जन्म से मृत्यु पर्यन्त अनेक स्थितियों में रहता है- बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था। ये हमारे चलने की स्थिति है, जो समयानुसार आती-जाती है। इसे भी हम चाहते नहीं क्योंकि कोईाी वृद्धावस्था को नहीं चाहता, इसी प्रकार से वर्तमान में हम जिस-जिस स्थिति में हैं, उसी में रुके रहें अर्थात् बच्चा, बच्चा रहे, वृद्ध, वृद्ध ही बना रहे, इसे भी कोई नहीं चाहता, लेकिन इसे कोई न रोका पाया है, न रोक पाएगा। भर्तृहरि जी ने कहा है-


भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः, तपो न तप्तं वयमेव तप्तः।


कालो न यातो वयमेव याताः, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।।


– वैराग्य शतक 12


अर्थात्- हम सांसारिक विषय भोगों को भोग नहीं पाए, अपितु उन भोगों को प्राप्त करने की चिन्ता ने हमें भोग लिया, हमने तप नहीं किया, अपितु आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक ताप जीवन भर हमें तपाते रहे। भोगों को भोगते-भोगते हम काल को नहीं काट पाए, काल ने हमें ही नष्ट कर दिया। इसी प्रकार से भोगों को प्राप्त करने की हमारी तृष्णा बूढ़ी नहीं हुई, अपितु हम ही बूढ़े हो गए, भोगों के रहते हम ही भोगने में असमर्थ हो गए।


इसलिए हमें विचार करना चाहिए कि मैं ऐसी कामना क्यों कर रहा हूँ, जो पूरी नहीं होगी जैसे कि मैं चलता रहूँ, लेकिन समाप्ति रूप परिणाम न आए या स्थिर रहूँ और ऊबूँ नहीं। आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन के रहते, हम जो भी कर्म करते हैं, उसका फल दुःख या सुख के रूप में मिलेगा ही, शुभ कर्मों से सुख, अशुभ कर्मों से दुःख, इसे कोई बदल नहीं सकता। हम भोगों को भोगना तो चाहते हैं किन्तु इन्द्रियाँ सीमित शक्ति से युक्त है अर्थात् सीमा के आगे भोग नहीं पाते और दुःखी हो जाते हैं। हमें भोगों को मात्र भोगने की दृष्टि से देखना बन्द करके जीवन को सुचारु रूप से चलाए रखने के लिए पदार्थों की आवश्यकता जान कर प्रयोग करने का विचार बनाना होगा, तभी हम दुःखों को कम कर सकते हैं। ऐसा तभी सभव होगा जब हम जीवन की सार्थकता आध्यात्मिक रूप से समझ कर अपने व्यवहारों में परिवर्तन करेंगे। तब हम अपने जीवन स्तर को आगे ले जाने में सफल होंगे।


रात्रि में सोने से पहले हमें दिनभर के कार्यों का चिन्तन अवश्य करना चाहिए और शुभ-अशुभ कर्मों को पहचानने का प्रयास करके शुभ कर्मों को पकड़ना, अशुभ कर्मों को छोड़ना ही होगा।



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