यज्ञशाला

यज्ञशाला


        स्वाध्याय, सन्ध्योपासना और अग्निहोत्र के निमित्त आदर्श गृहस्थ में एक निश्चित स्थान या कमरा आदि होना चाहिए जो शयन, भोजन आदि अन्य कार्यों के लिये प्रयुक्त न हो। +


        गृहशाला के निर्माण के समय सर्वप्रथम अग्निहोत्र शाला का विधान पवित्र वेदों में किया है। घर के विषय में सबसे प्रथम प्रश्न कमरों की संख्या का उठता है। इसका उत्तर (अथर्व0 ९७) में इस प्रकार दिया है-


हविर्धानं अग्निशालं, पत्नीनां सदन।


सदः सदो देवानामसि देविशाले॥


       अर्थात् एक आदर्श घर का निर्माण कराते हुए (१) हविर्धानं =अग्निहोत्र का कमरा (२) अग्निशाला =रसोई घर (३) पत्नीनां सदन =स्त्रियों के रहन का कमरा (४) सदः = पुरुषों की बैठक और (५) सदो देवानाम् =अतिथि गृह बनवाना चाहिए। यहाँ यज्ञशाला का प्रथम स्थान है। यज्ञमय वातावरण वैदिक स्वर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है।


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