ऋषि दयानन्द के अनुसार वर्ण व्यवस्था

  ऋषि दयानन्द के अनुसार वर्ण व्यवस्था


    वर्ण-व्यवस्था को महर्षि दयानन्द जन्म के आधार पर न मानकर गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर मानते हैं। इसके लिए वे वेदों, शास्त्रों और मनुस्मृति आदि धर्म-ग्रन्थों के अनेक उदाहरण देते हैं। साथ ही वैदिक काल, रामायण काल, महाभारत काल तक वर्ण-व्यवस्था के इसी स्वरूप की मान्यता थी, ऐसा बताते हैं। महर्षि की मान्यता है कि जब से (महाभारत काल के पश्चात् से) वर्ण-व्यवस्था को जन्मगत माना जाने लगा तभी से भारत के पतन, पराभव, दीनता ओर दासता का मार्ग खुला। जन्मगत जाति-व्यवस्था तो वर्ण-व्यवस्था नहीं, वरन् मरण-व्यवस्था है, ऐसा महर्षि का विचार है। ऋषि के अनुसार, वर्ण व जाति एक वस्तु नहीं है। "आकतिकर्जाति लिंगाख्या' 'समान प्रसवात्मिका जाति:' जाति आकृति से पहचानी जाती है अथवा समान प्रसव से। इस प्रकार मनुष्य-जाति एक है, यह ईश्वर कृत है, किन्तु 'वृणोतीति वर्णः' वर्ण वह है जिसका गुण, कर्म, स्वभावानुसार चयन होता है। वर्ण चार हैं ब्राह्मय क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। ये मनुष्यकृत होने से बदले जा सकते हैं-'शुद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्वैति शूद्रताम्'                            -(मनुस्मृति)


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