महर्षि दयानन्द सरस्वती और शिव

     महर्षि दयानन्द सरस्वती और शिव              


14 वर्ष का मूलशंकर अपने पिता की आज्ञा में शिवरात्री का (व्रत) करतासरस्वती और शिव है। रात भर जागरण का संकल्प लेकर। पिता ने कि शिव संसार का कल्याण करता है। दुष्टों और पापियो का करता है। परन्तु शिव की पिण्डी पर चूहो को देखकर बालक होता है। यह शिव तो अपनी रक्षा नहीं कर सकता औरो की क्या राप का पिण्डी पर चहो को देख B और संसार का कल्याण कैसे करेगा-यह शिव नहीं है। 


। "यदि कोई शिव है तो वह कहां है और कैसा हैइसी ऊहापोह और वर्ष बीत जाते है और 22 वर्ष का यह युवक सच्चे शिव सा ऊहापोह की खोज में घर स निकल पड़ता है और एक दिन पा लेता है पता शिव का और यह सब एक दिन में नहीं हो गया 14 इस युवक का-कहां-कहां नहीं भटका जंगलों में, पहाडो ली नदिया म और अन्तोतगत्वा गरु विरजानन्द के चरणों ॥ के प्रचार और प्रसार में। यह मूलशंकर और कोई नहीं महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वता है। आपने कभी शिव की एक तस्वीर देखी होगी जिसके सिर पर गगा बहती दिखाई गई है और माथे पर चन्द्रमा दिखाया गया है। इसका कठ नाला है और गले में सांप लटका रखा है और उसे भिनेत्रधारी भी दिखाया गया है। मैं शिव भक्तों के विचार में ऋषि दयानन्द को ही शिव बताने जा रहा हूँ:


1. शिव का अर्थ है कल्याण करने वाला और ऋषि दयानन्द ने संसार का कल्याण किया।


2. शिव के सिर पर गंगा बहती दिखाई है। इतनी बड़ी नदी सिर पर कैसे आ सकती है। वह ज्ञान की गंगा है ऋषि दयानन्द के सिर में मस्तिष्क में ज्ञान की गंगा बहती थी-अमर ग्रंथ "सत्यार्थ प्रकाश" उनकी ज्ञान की गंगा का ही परिणाम है। वेद भाष्य करके उन्होंने ज्ञान विज्ञान का भण्डार जन-जन के लिए प्रकाशित कर दिया। 


3. शिव के माथे पर चन्द्रमा दिखाया है। चन्द्रमा माथे पर कैसे आ सकता है। लाखो करोड़ो मील दूर और लाखो टन भार वाला चन्द्रमा माथे पर नहीं आ सकता। चन्द्रमा प्रतीक है शीतलता का, सहन शक्ति का। इस दृष्टि से भी दयानन्द खरे उतरते हैं। ऋषि दयानन्द 20 जून 1875 को पूना उनक 15 प्रवचन हए। पना केवल में पधारे। वहां उनके 15 प्रवचन हए। पना में उनके आवास के दौरान सत्य के विरोधियों ने एक व्यक्ति को गधे पर बिठाकर आर उसका करके उस पर दयानन्द लिख दिया आर जलूस गालिया दी। दयानन्द के भक्त ऋषि के पास गए आर बताय करक उस पर दयानन्द लिख दिया और जलस निकाला और दयानन्द को यानन्द के भक्त ऋषि के पास गए और बताया कि वे उनका अपमान कर रहे है,सुन कर शान्त चित दयानन्द नका अपमान कर रहे है, सुन कर शान्त चित दयानन्द ने कहा "असली दयानन्द होगा। यह भी दयानन्द के मार्थ पर चन्द्रमा तो तुम्हारे सामने बैठा है और कोई नकल आर काई नकली दयानन्द होगा तो उसका वही हाल दयानन्द शंकर थे। 


4 .शंकर के कंठ पर नील है अर्थात् विष पी कर अमृत है। दयानन्द को लोगो ने 17 बार विपापलाया पर ही बाँटते रहेकिसी को सजा नहीं दिलावाई। नन्द का लोगो ने 17 बार विष पिलाया परन्तु वे ज्ञान रूपी अमृत 5. शकर के गले में सांप है इसका भाव है जो हमें नुकसान


5. शकर के गले में साप ह इसका मान हैऋषि का रसोईया जगन्नाथ था. उसने एक षडयन्त्र क तह हुचाए उसका भी गले लगाना। दयानन्द इस कसौटी पर भी खरे उतरते के दध में भयंकर विष मिलाकर दे दिया। महर्षि रात भर उल्टा करत रहे, किसी को बताया तक नहीं, बल्कि जगन्नाथ का बुलाकर कहां-"जगन्नाथ तने बहुत बुरा किया। मैंने बहुत काम करना थापा का भाष्य भी अभी अधरा है। त इस देश से दूर नेपाल भाग जाा पार मेरे भक्तों को पता चल गया तो तू पकड़ा जाएगा। तेरे प्राण संकट पड जाएंगे।" ऋषि के पास 500/- रूपये थे उसे दिये और कहा तू नेपाल भाग जा। वाह रे ऋषि तू सचमुच कितना दयालु था अपने कातिल को भी क्षमा कर दिया, यह थी शंकर रूपी दयानन्द पांचवी पहचान-साप को भी गले लगाया।


6. शिव का तीसरा नेत्र तस्वीर में दिखाया है। वस्तुतः यह नेत्र विवेक का प्रतीक है सत्य और असत्य का विवेक। इसीलिए आर्य समाज को ऋषि ने पांचवा नियम दिया सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए। अतः आप स्वयं देखे कि ऋषि दयानन्द, संसार का कल्याण करने वाले ऋषि दयानन्द, क्या किसी शिव से कम थे?


                                                                                                   - स्वामी दयानन्द


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