इस देश का नाम क्या था

इस देश का नाम क्या था


        प्रश्न-प्रथम इस देश का नाम क्या था और इसमें कौन बसते थे?


        उत्तर-इसके पूर्व इस देश का नाम कोई भी नहीं था और न कोई आर्यों के पूर्व इस देश में बसते थे, क्योंकि आर्य लोग सृष्टि की आदि में कुछ काल के पश्चात् तिब्बत से सीधे इसी देश में आकर बसे थे।


         प्रश्न-कोई कहते हैं कि ये लोग ईरान से आये। इसी से इन लोगों का नाम आर्य हुआ है। इनके पूर्व यहाँ जङ्गली लोग बसते थे कि जिनको असुर और राक्षस कहते थे। आर्य लोग अपने को देवता बतलाते थे और उनका जब संग्राम हुआ उसका नाम देवासुर-संग्राम कथाओं में ठहराया।


       उत्तर-यह बात सर्वथा झूठ है, क्योंकिक्योंकि


विजानीह्यार्यान् ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्॥


 उत शूद्र उत आर्ये॥


          यह भी वेद का प्रमाण हैयह लिख चुके हैं कि आर्य नाम धार्मिक, विद्वान्, आप्त पुरुषों का और इनसे विपरीत जनों का नाम दस्यु अर्थात् डाकू, दुष्ट अधार्मिक और अविद्वान् है तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य द्विजों का नाम आर्य और शूद्र का नाम अनार्य अर्थात् अनाड़ी है। जब वेद ऐसे कहता है तो दूसरे विदेशियों के कपोलकल्पित लेख को बुद्धिमान् लोग कभी नहीं मान सकते और देवासुर-संग्राम में आर्यावर्तीय अर्जुन तथा महाराजा दशरथ आदि; हिमालय पहाड़ में आर्य और दस्यु, म्लेच्छ, असुरों का जो युद्ध हुआ था; उसमें देव अर्थात् आर्यों की रक्षा और असुरों के पराजय करने को सहायक हुए थे। इससे यही सिद्ध होता है कि आर्यावर्त के बाहर चारों ओर जो हिमालय के पूर्व आग्नेय, दक्षिण, नैर्ऋत, पश्चिम, वायव्य, उत्तर, ईशान देश में मनुष्य रहते हैं उन्हीं का नाम असुर सिद्ध होता है, क्योंकि जब-जब हिमालय प्रदेशस्थ आयाँ पर लड़ने को चढ़ाई करते थे तब-तब यहाँ के राजा-महाराजा लोग उन्हीं उत्तर आदि देशों में आर्यों के सहायक होते थे और जो श्री रामचन्द्रजी से दक्षिण में युद्ध हुआ है, उसका नाम देवासुर संग्राम नहीं है, किन्तु उसको राम-रावण अथवा आर्य और राक्षसों का संग्राम कहते हैं। 


       किसी संस्कृतग्रन्थ में वा इतिहास में नहीं लिखा कि आर्यलोग ईरान से आये और यहाँ के जङ्गलियों को लड़करजयपाके, निकालके इस देश के राजा हुए। पुनः विदेशियों का लेख माननीय कैसे हो सकता है? और


आर्यवाचो म्लेच्छवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः॥१॥


म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ॥२॥ 


         जो आर्यावर्त देश से भिन्न देश हैं वे दस्युदेश और म्लेच्छदेश कहाते हैं। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आर्यावर्त से भिन्न पूर्व देश से लेकर ईशान, उत्तर, वायव्य और पश्चिम देशों में रहनेवालों का नाम दस्य और म्लेच्छ तथा असर है और नैर्ऋत, दक्षिण तथा आग्रेय दिशाओं में आर्यावर्त देश से भिन्न रहनेवाले मनुष्यों का नाम राक्षस है। अब भी देख लो ! हबशी लोगों का स्वरूप भयङ्कर जैसा राक्षसों का वर्णन किया है वैसा ही दीख पड़ता है और आर्यावर्त की सूध पर नीचे रहनेवालों का नाम नाग और उस देश का नाम पाताल इसलिए कहते हैं कि यह देश आर्यावर्तीय मनुष्यों के पाद अर्थात् पग के तले है और उनके नागवंशी अर्थात् नाग नामवाले पुरुष के वंश के राजा होते थेठसी की उलोपी राजकन्या से अर्जुन का विवाह हुआ था, अर्थात् इक्ष्वाकु से लेकर कौरव-पाण्डव तक सर्वभूगोल में आर्यों का राज्य और वेदों का थोड़ा-थोड़ा प्रचार आर्यावर्त से भिन्न देशों में भी रहा।


        इसमें यह प्रमाण है कि ब्रह्मा का पुत्र विराट्, विराट् का मन, मन के मरीच्यादि दश, इनके स्वायंभवादि सात राजा और उनके सन्तान इक्ष्वाकु आदि राजा जो आर्यावर्त के प्रथम राजा हए जिन्होंने यह आर्यावर्त बसाया है।


-सत्यार्थप्रकाश, अष्टम-समुल्लास


पुन: महर्षि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश के एकादश समुल्लास


                                                                                                


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