एक श्रेष्ठ राष्ट्र की परिकल्पना और भारत

            एक श्रेष्ठ राष्ट्र की परिकल्पना और भारत   


भारत एक सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र है। यह राष्ट्र पूर्णतया प्रत्येक में सुरक्षित है | प्रकृति ने हमारे देश को एक किले में - सुरक्षा दी है भारत के उत्तर में शान से खड़ा हिमालय व पूरब , पश्चिम और दक्षिण आदि दिशाओं में फैला  समुद्र भारतवर्ष की रक्षा कर रहा है। भारतवर्ष की श्रेष्ठता का वर्णन करते हुए मैथिलिशरण गुप्त जी अपनी प्रसिद्ध कला कृति भारत भारती में लिखते है


भूलोक का गौरव प्रकति का पुण्य लीला स्थल कहाँ ,


फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगा जल जहाँ ।


सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?


उसका कि जो ऋषि भूमि है वह कौन? भारतवर्ष है।


भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता:


          भारतीय संस्कति बलिदानी संस्कृति है। जिस राजसत्ता  के लिए भाईयों में भयंकर विद्रोह होता है, जिसकी आसक्ति का त्याग देवताओं के लिए भी कठिन है, उस राज्यलक्ष्मी का पिता के संकेत पर क्षणभर में त्याग कर वन को प्रस्थान कर लिया|  परन्तु मुखमण्डल पर विकार की एक रेखा तक नहीं उभरी, ऐसे महापुरुष राम की यशोगाथा का वर्णन शब्दों में कैसे किया जा सकता है। भारतीय संस्कृति में दान को बहुत ऊचा पद दिया गया है


         ''हस्तस्य भूषणं दानम्' अर्थात् हमारे हाथों का आभूषण दान है | इत्यादि सूक्तियाँ दान की महिमा का निर्देश करती हैं | अभावग्रस्त, दु:खी, निर्धन, पराश्रित, अपरिग्रही व्यक्ति को मानवीय भावना से प्रेरित होकर जब हम किसी उपादेय वस्तु के माध्यम से किसी की सहायता करते हैं, तो यही भारतीय संस्कृति में दान कहलाता है। किसी पवित्र समय में सुपात्र का विचार कर, पवित्र मन से न्यायोपार्जित धन का यदि थोड़ा सा भी  दान किया जाये, तो वह लोक में परम  सुख-शान्ति  और  परलोक में अनन्त फल देने वाला माना गया है।


            सस्कृति का अर्थ मनुष्य का आन्तरिक विकास. पारस्परिक सद्द्व्यवहार और एक दूसरे को समझने की शक्ति है। वस्तुतः संस्कृति से अभिप्राय मानव की मानसिक, नैतिक, भौतिक, आर्थिक एवं जीवन की समस्त उपलब्धियों की समग्रता से है।


              विश्व   के सभी देशों किन्तु भारतीय संस्कृति प्राचीन और विशिष्ट हैभारतवर्ष की संस्कृति को किन्तु भारतीय संस्कृति विश्व के सभी देशों की अपनी-अपनी संस्कृति है किन्तु भारतीय संस्कृति विश्व की संस्कृतियों में सबसे प्राचीन और विशिष्ट हैसमय-समय पर विजेताओं ने भारतवर्ष की संस्कृति को आरोपित करने का प्रयास किया है, किन्तु भारतीय संस्कृति ने उन संस्कृतियों को आत्मसात् करते हुए अपना अस्तित्व अक्षुण्ण रखा। भारतीय संस्कृति में सदाचार एवं सच्चरित्रता का आरम्भिक युग से ही महत्त्व रहा है। इनके बिना सामाजिक जीवन असंभव होता है और व्यक्तिगत सुख एवं शान्ति की कल्पना भी न होती हैभारत में आचार तथा चरित्र की समृद्धि ने मानव को शरीरतः केवल सुखी ही नहीं बनाया अपितु हृदय को भी उदार बनाया है। परिणामत: मानव पारस्परिक व्यवहार में स्वार्थ और संकीर्णता से ऊपर उठा और उसमें उदात्त भावनाओं का स्फुरण हुआ है।


। आत्मसंयम और अनासक्ति का एक उज्ज्वल दृष्टान्त महाभारत में वर्णित है जो भारतीय संस्कृति की आभा में सुगन्धि का योगदान करता है। वह दृष्टान्त निम्न है- अर्जुन द्वारा सम्पूर्ण कौरवों को पराजित करने पर भीमसेन ने जब सुशर्मा को कैद कर लिया, तब तेरहवें वर्ष का अज्ञातवास समाप्त हो जाने पर पाण्डव प्रकट हुए। अर्जुन की इस वीरता से प्रसन्न हुए महाराज विराट ने अपनी पुत्री उत्तरा के विवाह का प्रस्ताव अर्जुन के सामने रखा, तब कुन्तीपुत्र अर्जुन ने मत्स्यनरेश से कहा - हेराजन ! मैं आपकी पुत्री को पत्रवधू के रूप में स्वीकार करता है। अर्जन के इन वचनों से सम्पूर्ण सभ्य सभाअत्यन्त प्रसन्न हुई। इन्हीं आप्त विचारों से सिंचित हमारी भारतीय संस्कति की अमूल्य नैतिक धरोहर उत्कर्ष को)प्राप्त है एवं इन्हीं उदात्त भावनाओं के कारण भारतीय संस्कृति का मस्तिष्क हमेशा देदीप्यमान रहा 


भारतीय संस्कृति में त्याग की अविरलधारा अनन्तकाल से प्रवाहमान है। रामायण, गीता, उपनिषद् आदि भारतीय सभ्यता के शिरोमणि ग्रन्थ त्याग और बलिदान वर्ष की महिमा के महान् गायक हैं। भारतीय ऋषि-मुनियों का जीवन इस त्यागवृत्ति का अनुपम उदाहरण हैयह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बिना त्याग एवं बलिदान के इसी कोई भी संत और महात्मा, महापुरुष के पद को प्राप्त नहीं कर सकता। यह त्याग है क्या? किसी शाश्वत नैतिक मल्य की रक्षा के लिए अपने वैयक्तिक सुखों, सांसारिक विषयभोगों, जीवन की उच्च सुविधाओं पर प्राणों का बलिदान कर देना ही त्याग है। यही भारतीय संस्कृति और सभ्यता का आदर्श हैभक्त की सभ्यता और संस्कृति को देखकर


अपने राज्य की सभ्यता और संस्कृति को देखकर ही राजा अश्वपति ने उद्घोषणा की थी कि:


                  न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः।


                नानाहिताग्निविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कतः।।


नानाहिताग्निविद्वान् मेरे राज्य में कोई भी चोर, डाक नहीं है, कोई भी लालची नहीं है और कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो नित्य सन्ध्योपासना यज्ञादि न करता हो, कोई भी अविद्वान् नहीं है और कोई व्यभिचारी नहीं है तो व्यभिचारिणी होने का . प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। 


ऐसी सभ्यताओं के कारण ही यह हमारा देश विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित था। विदेशी छात्र-छात्राएँ ९ भारतवर्ष में आकर वेद-विद्या को ग्रहण किया करते थे।कथा कथा अपने इस ज्ञान-विज्ञान के कारण अपने भारत वर्ष का नाम सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध था।


                         भारतवर्ष की महानता के कुछ कारण:


ईश्वर ने सृष्टि रचना के पश्चात् अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नामक चारों ऋषियों को वेद का ज्ञान भी भारतवर्ष की मही पर दिया थातत्पश्चात् इसी राष्ट्र से सम्पूर्ण विश्व में वेद ज्ञान फैला था विष्णु, व्यास, कपिल और गौतम जैसे ऋषि मुनियों ने भी) अपने इसी राष्ट्र में जन्म लिया है


मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी जैसे महान् उपनिषद् राजा और योगीराज श्री कृष्ण चन्द्र जी जैसे योगी भी भारत वर्ष की मही पर उत्पन्न हुए है।                                                                         सीता, सावित्री जैसी पतिव्रता नारी और रानी लक्ष्मीबाई, पद्मावती और दर्गावती जैसी वीरांगणाएं भीइसी भारतवर्ष की पवित्र अवनी पर उत्पन्न हुई है।


महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी और पृथ्वीराज चौहान जैसे महान योद्धा, वीर पराक्रमी और स्वाभिमानी राजा भी भारतवर्ष में ही उत्पन्न हारा है। 


राजा भी भारतवर्ष में ही उत्पन्न हारा है। चन्द्र शेखर आजाद, शहीदे-आजम भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे देश भक्त वीर बलिदानी भी भारत वर्ष में हुए है। 


भारतवर्ष के मन्दिर, राजमहल, दिल्ली का लौह स्तम्भ व लालकिला, और आगरा का प्रसिद्ध ताजमहल जैसी कलाकृति व प्राचीन सभ्यता से अवगत कराने वाली इमारतें भी भारतवर्ष में ही उपलब्ध हैं।


आदि में जाने कौन-कौन से कारण होंगे जिनके माध्यम से भारतवर्ष की श्रेष्ठता सामने आती है


हमें अपने आप पर गर्व होना चाहिए क्योंकि हमने ऋषियों की पवित्र अवनी भारतभूमि पर जन्म लिया . है। हमारे देश का हम पर बहुत उपकार है क्योंकि हम जिस देश की मिट्टी पर आनन्दपूर्वक खेले है, जिसके अन्न से हमारी देह का पालन-पोषण हो रहा है व जिसकी वायु ने हमारे जीवन का संचार किया है ऐसे में उस देश " का उपकार कैसे नहीं हो सकता। हमें भी इस उपकार के बदले में कछ ना कछ अवश्य अपने देश को देना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने भी अपने शौर्य और पराक्रम के द्वारा अपने देश का नाम रोशन किया है यथा- महाराणा प्रताप सिंह, वीर शिवाजी, पृथ्वीराज चौहान आदि सभी ने विदेशी आक्रमणकारियों से भारतवर्ष व अपने मान मर्यादा और सभ्यता की रक्षा करते हुए रण में वीरगति को प्राप्त हुए है | 


Popular posts from this blog

ब्रह्मचर्य और दिनचर्या

वैदिक धर्म की विशेषताएं 

अंधविश्वास : किसी भी जीव की हत्या करना पाप है, किन्तु मक्खी, मच्छर, कीड़े मकोड़े को मारने में कोई पाप नही होता ।