माता संतान का निर्माण करनेवाली है

*माता निर्माण करनेवाली होती है*


माता ही अपने बच्चे का निर्माण करनेवाली होती है। प्राचीन इतिहास में सबसे सुन्दर उदाहरण *मदालसा* देवी का है। *मदालसा* के तीन पुत्र हुए। उनके नाम रखे गये―विक्रान्त, सुबाहु और अरिदमन। माता उन्हें लोरी देती हुई कहती―


*शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि*
*संसारमायापरिवर्जितोऽसि ।*
*संसारमायां त्यज मोहनिद्रां*
*मदालसा शिक्षयतीह बालम् ।।*
*भावार्थ*— _हे पुत्र ! तू शुद्ध है, बुद्ध है, निरंजन=निर्दोष है, संसार की माया से रहित है। इस संसार की माया को त्याग दे। उठ, खड़ा हो, मोह को परे हटा। इस प्रकार मदालसा अपने पुत्र को शिक्षा देती है।_


इस शिक्षा का परिणाम क्या हुआ? तीनों पुत्र राज-पाट का मोह त्यागकर वनों को चले गये। यह स्थिति देख महाराज ने कहा―देवी! राज-पाट कौन सम्भालेगा, क्या सबको सन्यासी बना देगी? जब चौथा पुत्र उत्पन्न हुआ तब मदालसा ने उसका नाम रखा―अलर्क। माता ने उसे राजनीति का उपदेश दिया। उसे लोरी देते हुए माता कहती थी―


*धन्योऽसि रे यो वसुधामशत्रु-*
*रेकश्चिरं पालयिताऽसि पुत्र !*
*तत्पालनादस्तु सुखोपभोगो*
*धर्मात् फलं प्राप्स्यसि चामरत्वम् ।।*
―मार्कण्डेयपुराण २६।३५
_हे पुत्र! तू धन्य है जो अकेला ही शत्रुओं से रहित होकर इस पृथिवी का पालन कर रहा है। धर्मपूर्वक प्रजापालन से तुझे इस लोक में सुख और मरने पर मोक्ष की प्राप्ति होगी।_


राज्य की उत्तम व्यवस्था का उपदेश देते हुए वह कहती―
*राज्यं कुर्वन् सुहृदो नन्दयेथाः*
*साधून् रक्षंस्तात ! यज्ञैर्यजेथाः ।*
*दुष्टान्निघ्नन् वैरिणश्चाजिमध्ये*
*गोविप्रार्थे वत्स ! मृत्युं व्रजेथाः ।।*
―मा० पु० २६।४१
_हे पुत्र ! तू राज्य करते हुए अपने मित्रों को आनन्दित करना, साधुओं=श्रेष्ठ पुरुषों की रक्षा करते हुए खूब यज्ञ करना। गौ और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए संग्राम-भूमि में शत्रुओं को मौत के घाट उतारता हुआ तू स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त हो जाना।_


आज माताएँ अपने कर्त्तव्य को भूल चुकी हैं। आज माता और पिताओं को बच्चे को गोद लेने में शर्म आती है। बच्चे नौकरानी अथवा 'आया' की गोद में पलते हैं। परिणामस्वरूप बालकों का सुनिर्माण नहीं हो पाता।
बालकों पर घर के वातावरण, रहन-सहन और आचार-विचार का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। जो माता-पिता आदि स्वयं किसी को 'नमस्ते' नहीं करते। जिन परिवारों में माता-पिता देर से उठते हैं वहाँ बच्चे भी देर से उठते हैं। जो पिता बीड़ी, सिगरेट, मद्य-मांस आदि का सेवन करते हैं उनके बच्चे भी इन दुर्गुणों से बच नहीं सकते। इसके विपरीत जिन परिवारों में सन्ध्या और यज्ञ होता है, आसन और प्राणायाम का अभ्यास होता है उन परिवारों के बच्चों में भी वेसे ही गुण विकसित हो जाते हैं। यदि माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे श्रेष्ठ, सदाचारी और आदर्श नागरिक बनें तो माता-पिता को स्वयं अपने जीवन में परिवर्तन लाना होगा। माता-पिता को अपने आचरण के द्वारा उन्हें शिक्षा देनी होगी।
अपने बच्चों को सदाचारी, सभ्य और श्रेष्ठ बच्चों की संगति में रखना चाहिए, दुराचारी, असभ्य और गुणहीन बच्चों की संगति से अपने बच्चों को दूर रक्खें।


[ *साभार: "आदर्श परिवार" पुस्तक से उद्धृत, लेखक: स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती* ]


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